{"vars":{"id": "130921:5012"}}

वाराणसी में तीन दिन में हुए 62 कोचिंग सेंटर सील, इतने दिन तक कैसे हुई नियमों की अनदेखी... जिम्मेदार कौन?

वाराणसी में तीन दिन के भीतर 62 कोचिंग संस्थान और लाइब्रेरी सील होने के बाद व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। बिना मानचित्र, अग्नि सुरक्षा और भवन मानकों के ये संस्थान आखिर वर्षों तक कैसे चलते रहे? कार्रवाई के बाद विभागों की जवाबदेही पर भी बहस तेज हो गई है।

 

वाराणसी: शहर में तीन दिनों के अंदर 62 कोचिंग सेंटरों और लाइब्रेरी को सील किए जाने के बाद अब सवाल सिर्फ अवैध निर्माण या नियमों के उल्लंघन का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली का बन गया है। वाराणसी विकास प्राधिकरण (वीडीए) की कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि बड़ी संख्या में शिक्षण संस्थान बिना स्वीकृत मानचित्र, अग्नि सुरक्षा व्यवस्था और निर्धारित भवन मानकों के लंबे समय से संचालित हो रहे थे। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब ये संस्थान महीनों नहीं बल्कि वर्षों से चल रहे थे, तब संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था आखिर कहां थी?

कार्रवाई के बाद व्यवस्था पर उठे सवाल

शहर के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे इन संस्थानों पर अब कार्रवाई हो रही है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय-समय पर नियमित निरीक्षण होता तो इतनी बड़ी संख्या में संस्थानों को एक साथ सील करने की नौबत ही नहीं आती।

लोगों का मानना है कि नियम केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। अगर भवन सुरक्षा, फायर सेफ्टी और मानचित्र स्वीकृति वास्तव में अनिवार्य हैं, तो उनकी नियमित जांच भी उतनी ही जरूरी है।

अभिभावकों ने उठाए जवाबदेही के सवाल

अभिभावकों का कहना है कि केवल सीलिंग अभियान चलाना स्थायी समाधान नहीं है। उनका मानना है कि पारदर्शी अनुमति प्रक्रिया, समय-समय पर अग्नि सुरक्षा ऑडिट, नियमित निरीक्षण और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय किए बिना ऐसी कार्रवाई का असर लंबे समय तक नहीं रहेगा। यदि निगरानी लगातार होती रहती तो विद्यार्थियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित रहती और संस्थानों को भी समय रहते नियमों का पालन करने का अवसर मिलता।

सबसे ज्यादा परेशानी छात्रों को

कार्रवाई का सीधा असर उन छात्रों पर पड़ा है, जिन्होंने पहले ही फीस जमा कर पढ़ाई शुरू कर दी थी। मलदहिया के छात्र सुभाष, आरती और नागेश का कहना है कि अचानक संस्थान बंद होने से उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है। कई छात्रों को यह भी पता नहीं है कि उनकी कक्षाएं कब और कहां शुरू होंगी। उनका कहना है कि नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन कार्रवाई का खामियाजा छात्रों को नहीं भुगतना चाहिए।

वसूली के आरोप भी आए सामने

कुछ कोचिंग संचालकों ने नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर दावा किया कि विभिन्न मानकों, निरीक्षण और जांच के नाम पर हर महीने निश्चित रकम मांगने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि यह मांग कौन करता था, लेकिन उनका कहना है कि इस व्यवस्था की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

असली सवाल सिर्फ कोचिंग नहीं, पूरी व्यवस्था पर

पूरे घटनाक्रम ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या संबंधित विभाग केवल शिकायत मिलने या बड़े अभियान के दौरान ही सक्रिय होते हैं। यदि नियमों का पालन पहले से सुनिश्चित कराया जाता, तो न छात्रों को परेशानी होती, न अभिभावकों में असमंजस पैदा होता और न ही एक साथ इतने संस्थानों पर कार्रवाई करनी पड़ती।

अब लोगों की नजर इस बात पर है कि क्या यह अभियान केवल कुछ दिनों की कार्रवाई बनकर रह जाएगा या फिर शहर में शिक्षण संस्थानों की नियमित निगरानी, अग्नि सुरक्षा और भवन मानकों को लेकर स्थायी व्यवस्था भी बनाई जाएगी। क्योंकि सवाल सिर्फ अवैध कोचिंग सेंटर का नहीं, बल्कि हजारों विद्यार्थियों की सुरक्षा और पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही का भी है।