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काशी के लोलार्क कुंड पर उमड़ रहा आस्थावानों का सैलाब, संतान सुख की कामना में दंपती लगा रहे आस्था की डुबकी

 

वाराणसी में लोलार्क षष्ठी के मौके पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। भदैनी स्थित लोलार्क कुंड में स्नान के लिए श्रद्धालुओं की करीब 3 किलोमीटर लंबी कतार लगी हुई है। कुंड की ओर जाने वाली आठों गलियां श्रद्धालुओं से भर गई हैं। देर रात 12 बजे से ही स्नान शुरू हो गया था और सूर्योदय के बाद श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ती गई। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कुंड में स्नान के लिए प्रत्येक श्रद्धालु को करीब 30 सेकंड का समय दिया जा रहा है। वहीं, कपड़े बदलने के लिए कुंड के बाहर अलग से व्यवस्था की गई है। स्नान के बाद श्रद्धालु एक फल का दान भी करते हैं।

लोलार्क षष्ठी पर संतान प्राप्ति की कामना लेकर देश-विदेश से श्रद्धालु काशी पहुंचे हैं। बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, बंगाल और नेपाल के अलावा पूर्वांचल के आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में लोग एक दिन पहले ही वाराणसी पहुंच गए थे। अधिकांश श्रद्धालु उदया तिथि की मान्यता के अनुसार सूर्योदय के बाद लोलार्क कुंड में स्नान करने पहुंचे।

सुबह की शुरुआत 51 डमरुओं के वादन के साथ आरती से हुई। इसके बाद धीरे-धीरे श्रद्धालुओं के जत्थे कुंड में स्नान के लिए पहुंचने लगे। आस्था के इस पर्व को देखते हुए प्रशासन ने भी सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के व्यापक इंतजाम किए हैं।

लोलार्क कुंड से पांडेय हवेली तक डबल बैरिकेडिंग

श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए भदैनी स्थित लोलार्क कुंड से पांडेय हवेली तक डबल बैरिकेडिंग की गई है। कुंड के आसपास जिग-जैग बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई है, ताकि भीड़ का दबाव एक जगह न बढ़े। प्रवेश और निकासी के लिए अलग-अलग रास्ते बनाए गए हैं। अत्याधुनिक ड्रोन के जरिए पूरे इलाके की निगरानी की जा रही है। मौसम और धूप को देखते हुए बैरिकेडिंग के ऊपर कपड़े की छांव भी लगाई गई है, जिससे श्रद्धालुओं को राहत मिल सके।

क्या है लोलार्क षष्ठी की मान्यता?

लोलार्क षष्ठी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। लोलार्क कुंड को सूर्यदेव से जुड़ा पवित्र कुंड माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी स्थान पर सूर्यदेव के रथ का पहिया गिरा था, जिसके कारण इसका नाम लोलार्क पड़ा।

मान्यता है कि लोलार्क षष्ठी के दिन पति-पत्नी यहां एक साथ स्नान करें और श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करें तो संतान सुख की प्राप्ति होती है। इसी आस्था के चलते हर साल लोलार्क षष्ठी पर देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में दंपती काशी पहुंचते हैं।