12 साल की उम्र में एसिड अटैक, 37 सर्जरी के बाद भी नहीं टूटा हौसला, पद्मश्री से सम्मानित हुईं 'काशी की लता' मंगला कपूर
देश की प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायिका और "काशी की लता" के नाम से प्रसिद्ध मंगला कपूर को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उनके संगीत, शिक्षा और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय योगदान का प्रतीक है। सम्मान मिलने के बाद मंगला कपूर ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि इस मुकाम तक पहुंचने का सफर बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण रहा है।
उन्होंने कहा, "मैं अपनी खुशी को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती। मेरे जैसी महिला के लिए पद्मश्री तक पहुंचना आसान नहीं था। यह सम्मान मेरे जीवन के संघर्षों और वर्षों की साधना का परिणाम है।"
12 साल की उम्र में तेजाब हमले का शिकार
ग्वालियर घराने से जुड़ी मंगला कपूर का जीवन साहस और आत्मविश्वास की अद्भुत मिसाल है। महज 12 वर्ष की उम्र में उन पर एसिड अटैक हुआ था। बाद में पता चला कि यह हमला परिवार से जुड़ी व्यावसायिक रंजिश के कारण कराया गया था।
इस हमले में उनका चेहरा और शरीर बुरी तरह झुलस गया। अगले छह वर्षों तक उनका इलाज चलता रहा। यह समय केवल शारीरिक पीड़ा का नहीं, बल्कि मानसिक संघर्ष और सामाजिक उपेक्षा का भी था।
मंगला कपूर कहती हैं कि आज भी उस घटना को याद कर उनकी आंखें नम हो जाती हैं। वह दर्द आज भी उनकी स्मृतियों में जीवित है।
समाज के तानों ने बढ़ाई मुश्किलें
हादसे के बाद उन्हें समाज की असंवेदनशीलता का भी सामना करना पड़ा। लंबे इलाज और कई सर्जरी के बाद जब उन्होंने दोबारा स्कूल जाना शुरू किया, तब सहपाठियों के तानों और मजाक ने उन्हें गहरा मानसिक आघात पहुंचाया।
उन्होंने बताया कि एक दिन स्कूल में अपमानित महसूस करने के बाद उनका नर्वस ब्रेकडाउन हो गया और फिर वह कभी नियमित रूप से स्कूल नहीं जा सकीं। बाद में उन्होंने घर से ही अपनी पढ़ाई पूरी की।
इस कठिन दौर में उनके पिता ने उनका सबसे बड़ा सहारा बनकर उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और जीवन से हार न मानने का हौसला दिया।
37 सर्जरी के बाद भी नहीं टूटा हौसला
मंगला कपूर के शरीर की अब तक 37 सर्जरी हो चुकी हैं। लेकिन उन्होंने कभी अपने सपनों को मरने नहीं दिया। उन्होंने संगीत को अपना संबल बनाया और उसी में नई पहचान तलाश ली।
उनके अनुसार, संगीत ने उन्हें जीवन में फिर से आत्मविश्वास दिया और संघर्षों से लड़ने की शक्ति प्रदान की। यही संगीत आगे चलकर उनकी पहचान और सम्मान का आधार बना।
मंदिर के भजन से शुरू हुआ सफर
कॉलेज के दिनों में एक मंदिर में भजन गाते समय लोगों ने पहली बार उनकी गायन प्रतिभा को पहचाना। उनकी मधुर आवाज ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद उन्हें विभिन्न मंचों पर प्रस्तुति देने के अवसर मिलने लगे।
धीरे-धीरे उनकी पहचान उनके चेहरे से नहीं, बल्कि उनकी आवाज से बनने लगी। देशभर में आयोजित संगीत कार्यक्रमों में उन्हें आमंत्रित किया जाने लगा और शास्त्रीय संगीत जगत में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाने लगा।
बीएचयू में तीन दशक तक दिया संगीत का ज्ञान
वर्ष 1989 में मंगला कपूर ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य शुरू किया। उन्होंने लगभग 30 वर्षों तक विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा दी और अनगिनत शिष्यों को तैयार किया।
शिक्षण के साथ-साथ उन्होंने देश-विदेश में अपनी प्रस्तुतियों से भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। वह मानती हैं कि संगीत उनके जीवन की "संजीवनी" रहा, जिसने उन्हें हर कठिनाई से उबरने की शक्ति दी।
आज पद्मश्री सम्मान के साथ मंगला कपूर की यह यात्रा केवल एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है जो जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। उनका जीवन संदेश देता है कि साहस, धैर्य और समर्पण के बल पर कोई भी व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों को हराकर सफलता की नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है।