प्राचीन धरोहर या सामान्य अवशेष? वाराणसी में गंगा से मिले प्राचीन शिवलिंग को लेकर कई सवाल... अब जांच का इंतजार
Varanasi : सूजाबाद-डुमरी क्षेत्र में गंगा नदी से मिले एक कथित प्राचीन शिवलिंग को लेकर क्षेत्र में चर्चा का माहौल बना हुआ है। स्थानीय लोगों का दावा है कि यह शिवलिंग मछुआरों को गंगा नदी में मिला था और इसकी प्राचीनता को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। कुछ लोग इसे लगभग 2500 वर्ष पुराना बता रहे हैं, जबकि कुछ ने इसे मौर्यकालीन अवशेष होने की संभावना जताई है।
इस मामले की पड़ताल के लिए Benaras Global Times की टीम मौके पर पहुँची। जांच के दौरान पता चला कि स्थानीय निवासियों ने शिवलिंग को नदी से निकालने के बाद एक स्थान पर स्थापित कर दिया है। इतना ही नहीं, स्थापित किए जाने के बाद शिवलिंग पर काले रंग का पेंट भी किया गया, ताकि उसमें अधिक चमक दिखाई दे।
स्थानीय लोगों से बातचीत में यह जानकारी सामने आई कि शिवलिंग पर पेंट किए जाने के कारण उसकी वास्तविक स्थिति और प्राचीनता का आकलन करना और अधिक कठिन हो गया है।
स्थानीय लोगों ने उठाए सवाल
मौके पर मौजूद एक स्थानीय व्यक्ति ने शिवलिंग की प्राचीनता को लेकर सवाल खड़े करते हुए कहा कि यदि यह वास्तव में मौर्यकालीन शिवलिंग है, तो यह गंगा की धारा के विपरीत दिशा में बहकर यहां तक कैसे पहुंच गया? उनके अनुसार बिना वैज्ञानिक जांच के इसकी उम्र और ऐतिहासिक महत्व को लेकर कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
ASI को दी गई सूचना
शिवलिंग की वास्तविक आयु और ऐतिहासिक महत्व का पता लगाने के लिए *भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)* को भी इसकी जानकारी दिए जाने की बात सामने आई है। स्थानीय लोग अब विशेषज्ञों की जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि शिवलिंग वास्तव में कितना पुराना है और इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है।
जांच के बाद ही होगा सच सामने
फिलहाल शिवलिंग को लेकर सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी पुरावशेष की आयु और ऐतिहासिकता का निर्धारण केवल वैज्ञानिक परीक्षण और पुरातात्विक जांच के आधार पर ही किया जा सकता है। ऐसे में ASI या संबंधित विशेषज्ञ संस्थाओं की रिपोर्ट आने के बाद ही इस कथित प्राचीन शिवलिंग की वास्तविक कहानी सामने आ सकेगी।