एयर शो देखने के लिए छतों पर न जुटाएं भीड़, वाराणसी नगर निगम की एडवाइजरी; जर्जर मकानों को नोटिस
वाराणसी। नमो घाट पर होने वाले एयर शो को लेकर लोगों में उत्साह है। आसमान में लड़ाकू विमानों के करतब देखने के लिए गंगा किनारे स्थित मकानों की छतों पर भी बड़ी संख्या में लोगों के जुटने की आशंका है। इसे देखते हुए नगर निगम ने एडवाइजरी जारी कर लोगों से छतों पर अधिक भीड़ एकत्र नहीं करने की अपील की है। साथ ही, जर्जर मकानों के मालिकों को नोटिस भी दिए जा रहे हैं, ताकि पुराने और कमजोर भवनों पर अतिरिक्त भार पड़ने से बचाया जा सके।
गंगा किनारे कई पुराने मकान ऐसे हैं, जिनकी मजबूती समय के साथ प्रभावित हुई है। हाल में आई बाढ़ के बाद जमीन में नमी बनी हुई है। ऐसे में पहले से कमजोर, जर्जर या दरार वाले मकानों को लेकर विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि लड़ाकू विमानों की तेज आवाज का मतलब यह नहीं है कि उससे मकान गिरने लगेंगे। मकान की सुरक्षा उसकी नींव, निर्माण सामग्री, उम्र और जमीन की स्थिति जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है।
नींव और निर्माण सामग्री पर निर्भर करती है मकान की मजबूती
बीएचयू के तकनीकी विशेषज्ञ प्रो. केके पांडेय के मुताबिक, किसी भी भवन की मजबूती का आकलन उसकी नींव, निर्माण में इस्तेमाल सामग्री, उम्र और मिट्टी की प्रकृति को ध्यान में रखकर किया जाता है। पुराने मकानों में समय के साथ मजबूती कम हो सकती है। ऐसे भवनों की छतों पर एक साथ बड़ी संख्या में लोगों के जुटने से अतिरिक्त भार पड़ता है, इसलिए सावधानी जरूरी है।
भवनों का निर्माण करते समय भार सहने की क्षमता और सुरक्षा मानकों का ध्यान रखा जाता है। कुछ डिजाइन प्रक्रियाओं में भार पर 1.5 का सुरक्षा गुणांक भी इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, यह सभी मकानों पर समान रूप से लागू होने वाला नियम नहीं है। किसी भवन की वास्तविक क्षमता उसके डिजाइन, निर्माण की गुणवत्ता, उम्र और मौजूदा स्थिति पर निर्भर करती है।
रेतीली मिट्टी में क्या होता है लिक्विफैक्शन?
गंगा किनारे के कुछ इलाकों में रेतीली मिट्टी पर मकान बने हुए हैं। ऐसी मिट्टी में पानी की मात्रा अधिक होने और विशेष परिस्थितियों में तेज कंपन पड़ने से जमीन की मजबूती प्रभावित हो सकती है। इस प्रक्रिया को लिक्विफैक्शन यानी मृदा द्रवीकरण कहा जाता है।
इस स्थिति में मिट्टी के कणों के बीच पानी का दबाव बढ़ने से जमीन की भार सहने की क्षमता कम हो सकती है। इससे जमीन धंसने या भवन की नींव प्रभावित होने का खतरा रहता है। हालांकि, यह प्रक्रिया खास परिस्थितियों में होती है। केवल मिट्टी में नमी होने का मतलब यह नहीं है कि वहां लिक्विफैक्शन हो जाएगा।
नगवां में पहले भी सामने आ चुका है मकानों में दरारों का मामला
वाराणसी के नगवां स्थित गंगोत्री विहार में नवंबर 2021 में करीब 20 मकानों में दरारें आने का मामला सामने आया था। उस समय तकनीकी जांच में सीवर पाइप में सिल्ट जमा होने से पानी का बहाव बाधित होने और दबाव बढ़ने की बात सामने आई थी। पाइप में कंपन की समस्या का भी उल्लेख किया गया था।
यह मामला बताता है कि भवनों में दरारें आने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। ऐसे में किसी मकान में दरार दिखने पर उसके कारणों की तकनीकी जांच जरूरी है।
कितनी तेज होती है लड़ाकू विमानों की आवाज?
लड़ाकू विमान के इंजन के पास आवाज का स्तर 140 से 150 डेसीबल तक पहुंच सकता है। हालांकि, यह इंजन के नजदीक मापा जाने वाला स्तर है। जमीन पर किसी मकान तक पहुंचने वाली आवाज विमान की ऊंचाई, दूरी और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, तेज आवाज और जमीन में पैदा होने वाला कंपन अलग-अलग प्रभाव हैं। इसलिए केवल विमान की आवाज के आधार पर किसी मकान के गिरने की आशंका जताना सही नहीं होगा। भवन की वास्तविक स्थिति का आकलन उसकी संरचनात्मक मजबूती और अन्य तकनीकी पहलुओं के आधार पर ही किया जा सकता है।
जर्जर मकानों में रहने वाले लोग बरतें सावधानी
हाल में आई बाढ़ के बाद गंगा किनारे के इलाकों में नमी और पुराने भवनों की स्थिति को देखते हुए एहतियात बरतना जरूरी है। जिन मकानों में पहले से दरारें हैं या जिनकी नींव कमजोर है, वहां छत पर अधिक लोगों के जुटने से बचना चाहिए। नगर निगम की ओर से जारी नोटिस को गंभीरता से लेते हुए जरूरत पड़ने पर भवन विशेषज्ञ से जांच भी करानी चाहिए।
प्रो. केके पांडेय, तकनीकी विशेषज्ञ, बीएचयू के अनुसार, गंगा किनारे कई पुराने और कच्चे मकान हैं, जो अधिक भार सहने की स्थिति में नहीं हो सकते। हाल में बाढ़ आने से मिट्टी में नमी बनी हुई है। ऐसे में एहतियात के तौर पर लोगों को मकानों की छतों पर भीड़ जुटाने से बचना चाहिए।