वाराणसी में गंज शहीदा मस्जिद विवाद, दूसरा आदेश लगा और कुछ घंटों में हटा भी दिया गया
वाराणसी में काशी रेलवे स्टेशन विस्तार परियोजना के बीच गंज शहीदा मस्जिद को लेकर नोटिस विवाद गहरा गया है। पहले हटाने का नोटिस लगा, फिर ध्वस्तीकरण न होने की सूचना चस्पा की गई, लेकिन कुछ घंटों बाद उसे भी हटा लिया गया। रेलवे की चुप्पी से असमंजस बरकरार है।
वाराणसी: काशी रेलवे स्टेशन के विस्तारीकरण को लेकर गंज शहीदा मस्जिद से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। 13 जून को मस्जिद को हटाने संबंधी नोटिस लगाए जाने के बाद शुरू हुआ विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। मंगलवार को मस्जिद परिसर में एक दूसरा नोटिस चस्पा किया गया, जिसमें ध्वस्तीकरण नहीं किए जाने की बात कही गई थी, लेकिन कुछ ही घंटों बाद उसे भी हटा लिया गया। इस घटनाक्रम ने स्थानीय लोगों के बीच भ्रम और असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है।
दरअसल, 13 जून 2026 को गंज शहीदा मस्जिद परिसर में रेलवे की ओर से एक नोटिस लगाया गया था, जिसमें स्टेशन विस्तार परियोजना के तहत कार्रवाई का उल्लेख किया गया था। नोटिस सामने आने के बाद मामला तेजी से सुर्खियों में आ गया और सोशल मीडिया पर भी इसकी व्यापक चर्चा हुई। विवाद इतना बढ़ा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस पर प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
इसी बीच 23 जून को मस्जिद परिसर में एक नया नोटिस चस्पा किया गया। इस नोटिस में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई न किए जाने का उल्लेख था। नया नोटिस सामने आते ही स्थानीय लोगों और मस्जिद से जुड़े लोगों में राहत दिखाई दी। लोगों ने इसे सकारात्मक संकेत के रूप में देखा और माना कि फिलहाल मस्जिद को लेकर कोई कार्रवाई नहीं होगी।
हालांकि यह राहत ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी। शाम होते-होते उक्त नोटिस हटा लिया गया, जिसके बाद स्थिति फिर वहीं पहुंच गई जहां 13 जून के नोटिस के बाद थी। दूसरे नोटिस के हटने से लोगों के बीच नए सवाल खड़े हो गए और पूरे मामले को लेकर भ्रम और बढ़ गया।
इस बीच नोटिस चस्पा करने वाले एक व्यक्ति का बयान सामने आया है। खुद को रेलवे का फीडर मैन बताने वाले सुनील कुमार ने कहा कि उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर ही नया नोटिस लगाया था और बाद में उसी आदेश के तहत उसे हटाया भी गया। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि नोटिस लगाने और हटाने के पीछे अंतिम निर्णय किस स्तर पर लिया गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब तक रेलवे प्रशासन की ओर से इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। वाराणसी मंडल के अधिकारियों या उत्तर रेलवे के किसी वरिष्ठ अधिकारी का बयान सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। यही वजह है कि स्थानीय लोगों और आम नागरिकों के बीच स्थिति को लेकर भ्रम बना हुआ है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि दूसरा नोटिस अधिकृत नहीं था तो उसे किसने जारी किया और यदि वह वैध था तो फिर उसे हटाने की जरूरत क्यों पड़ी। वहीं यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या 13 जून को जारी मूल नोटिस अब भी प्रभावी है या उसमें कोई बदलाव किया गया है।