ज्ञानवापी केस में सुनवाई टली, वक्फ बोर्ड की अर्जी पर अब 18 सितंबर को होगी सुनवाई
वाराणसी के ज्ञानवापी से जुड़े 1991 के मुकदमे में आगे की कार्यवाही रोकने की सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की मांग पर सोमवार को सुनवाई हुई। बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर 2024 के आदेश का हवाला दिया। वादमित्र ने इसका विरोध किया। कोर्ट ने बोर्ड को जवाब के लिए समय दिया।
वाराणसी: ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण और हिंदुओं को पूजा-पाठ का अधिकार देने से संबंधित 1991 के मुकदमे में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से मुकदमे में आगे की कार्यवाही न करने की मांग को लेकर दाखिल प्रार्थना पत्र पर सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक) की अदालत में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं।
सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता तौहीद खान ने अदालत में सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर 2024 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि ज्ञानवापी से जुड़े लंबित मामलों में अगले आदेश तक कोई प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित नहीं किया जाना चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने मौजूदा मुकदमे में भी आगे की कार्यवाही पर रोक की मांग की।
वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दिया हवाला
वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता तौहीद खान ने कहा कि वकील अश्विनी उपाध्याय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल रिट याचिका में प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 से जुड़े मामलों में अगले आदेश तक प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित नहीं करने का अनुरोध किया गया था।
उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 12 दिसंबर 2024 को इस संबंध में आदेश पारित किया था। वक्फ बोर्ड का कहना है कि मौजूदा 1991 का मुकदमा भी उपासना स्थल अधिनियम से संबंधित है, इसलिए इस मामले में भी आगे की कार्यवाही पर रोक लागू होनी चाहिए।
वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि इसी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर ज्ञानवापी से जुड़े अन्य मामलों में भी अदालतों ने तत्काल कोई नया प्रभावी आदेश पारित नहीं किया।
जिला अदालत के आदेशों का भी दिया उदाहरण
तौहीद खान ने अदालत के सामने हाल की कार्यवाही का उदाहरण देते हुए कहा कि ज्ञानवापी परिसर में सीलबंद ताले के खराब कपड़े को बदलने के संबंध में शासन की ओर से विशेष वकील राजेश मिश्र ने प्रार्थना पत्र दिया था। जिला जज ने इस पर भी तत्काल कोई नया आदेश पारित नहीं किया।
उन्होंने एक अन्य मामले में कार्यवाही आगे नहीं बढ़ाए जाने का भी हवाला दिया। वक्फ बोर्ड का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की रोशनी में 1991 के इस मुकदमे में भी आगे की सुनवाई पर रोक लगनी चाहिए।
वादमित्र ने वक्फ बोर्ड की दलील का किया विरोध
वक्फ बोर्ड की मांग का वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी ने विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से इस मुकदमे को प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 के दायरे में बताते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में पांच याचिकाएं दाखिल की गई थीं।
वादमित्र के अनुसार, हाई कोर्ट ने 19 दिसंबर 2023 को इन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इसके साथ ही सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक) की अदालत को मुकदमे की सुनवाई छह महीने के भीतर पूरी कर उसका निस्तारण करने का निर्देश दिया गया था।
रस्तोगी ने अदालत में यह भी कहा कि हाई कोर्ट के इस फैसले को सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी थी।
'अश्विनी उपाध्याय की याचिका में वक्फ बोर्ड पक्षकार नहीं'
वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी ने अपनी आपत्ति में यह भी कहा कि अश्विनी उपाध्याय की सुप्रीम कोर्ट में लंबित रिट याचिका में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड पक्षकार नहीं है। ऐसे में उस याचिका के आधार पर मौजूदा मुकदमे की सुनवाई रोकने की मांग को उन्होंने निराधार बताया। उन्होंने अदालत से 1991 के मुकदमे की कार्यवाही जारी रखने की मांग की।
वक्फ बोर्ड को जवाब दाखिल करने के लिए मिला समय
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता ने अपनी ओर से वादमित्र की आपत्ति का जवाब रखने के लिए अदालत से समय मांगा। अदालत ने उनकी मांग स्वीकार कर ली। अब इस मामले में अगली सुनवाई 18 सितंबर को होगी। उस दिन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से वादमित्र की आपत्ति पर अपना पक्ष रखा जाएगा। इसके बाद अदालत आगे की कार्यवाही को लेकर निर्णय ले सकती है।