लोलार्क छठ आज: संतान की कामना से आधी रात से शुरू होगा स्नान, सात साल बाद बन रहा दुर्लभ संयोग
Lolark Chhath 2026: वाराणसी के भदैनी स्थित लोलार्क कुंड में 17 सितंबर को लोलार्क छठ मनाई जाएगी। संतान प्राप्ति की कामना से हजारों दंपती स्नान करेंगे। इस बार सात साल बाद विशेष ज्योतिषीय संयोग बन रहा है। जानें स्नान का शुभ मुहूर्त, धार्मिक मान्यता, प्रशासन की तैयारियां और लोलार्क कुंड का पौराणिक महत्व।
वाराणसी: काशी के भदैनी स्थित ऐतिहासिक लोलार्क कुंड में लोलार्क छठ को लेकर श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया है। संतान प्राप्ति की कामना से पूर्वांचल समेत कई राज्यों से दंपती यहां पहुंच रहे हैं। 17 सितंबर को लोलार्क षष्ठी पर कुंड में स्नान और लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन-पूजन का सिलसिला मध्य रात्रि से शुरू हो जाएगा। इस बार सात साल बाद लोलार्क षष्ठी पर विशेष ज्योतिषीय संयोग बन रहा है।
सात साल बाद बन रहा विशेष संयोग
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस बार लोलार्क छठ पर राजयोग और पांच महापुरुष योग समेत सात विशेष योगों का संयोग बन रहा है। इसके अलावा सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस संयोग में स्नान और पूजा का महत्व और बढ़ जाता है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के प्रो. सुभाष पांडेय के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 16 सितंबर की सुबह 8:55 बजे से 17 सितंबर की सुबह 10:26 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर लोलार्क छठ 17 सितंबर को मनाई जाएगी।
ब्रह्म मुहूर्त से शुरू होगा स्नान
लोलार्क कुंड में स्नान का क्रम 17 सितंबर को सुबह 3:55 बजे ब्रह्म मुहूर्त से शुरू होगा। सुबह 5:41 से 6:30 बजे तक विजय मुहूर्त रहेगा। इसके बाद सुबह 6:31 से 10:26 बजे तक स्नान और पूजा का सर्वोत्तम मुहूर्त बताया गया है।
हालांकि इस अवधि के बाद भी सूर्यास्त तक कुंड में स्नान और लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन-पूजन का सिलसिला चलता रहेगा।
लोलार्क छठ पर संतान सुख की कामना लेकर दंपती विशेष रूप से लोलार्क कुंड पहुंचते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से कुंड में स्नान और लोलार्केश्वर महादेव की पूजा करने से संतान संबंधी मनोकामना पूरी होती है। इसी आस्था के चलते हर साल बड़ी संख्या में दंपती यहां पहुंचते हैं।
यूपी के अलावा इन राज्यों से भी पहुंच रहे दंपती
लोलार्क छठ पर सिर्फ वाराणसी और आसपास के जिलों से ही नहीं, बल्कि पूर्वांचल के अलग-अलग हिस्सों के साथ बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी दंपतियों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है। इस बार भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना को देखते हुए प्रशासन ने पहले से तैयारियां शुरू कर दी थीं।
17 सितंबर की सुबह स्नान के समय भीड़ सबसे ज्यादा रहने की संभावना है। मंगलवार से ही कुंड के आसपास श्रद्धालुओं की कतार लगनी शुरू हो गई है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक सोनारपुरा से अस्सी मार्ग की ओर बैरिकेडिंग के बीच लंबी कतार बन गई है।
गोदौलिया मार्ग तक बैरिकेडिंग, धूप से बचाने के लिए पर्दे
श्रद्धालुओं की संभावित भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने कुंड से लेकर सोनारपुरा चौराहा और आगे गोदौलिया मार्ग तक बैरिकेडिंग कराई है। कतार में खड़े श्रद्धालुओं को धूप से बचाने के लिए बैरिकेडिंग के ऊपर पर्दे लगाए गए हैं।
नगर निगम की ओर से सफाई व्यवस्था के लिए टीमें लगाई गई हैं। कुंड की ओर जाने वाली गलियों में भी व्यवस्थाएं दुरुस्त की गई हैं। पुलिस और प्रशासन की ओर से भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा को लेकर तैयारियां की गई हैं।
षष्ठी पर कुंड के जल पर सीधे पड़ती हैं सूर्य की किरणें
लोलार्क कुंड की बनावट भी इसे दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग बनाती है। मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य की किरणें सीधे कुंड के जल पर पड़ती हैं। इसी वजह से सूर्य उपासना के इस पर्व पर लोलार्क कुंड में स्नान का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
‘लोलार्क’ का शाब्दिक अर्थ ‘चंचल सूर्य’ बताया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार सूर्यदेव के रथ का पहिया इसी स्थान पर धंस गया था और वहां से जलधारा फूट पड़ी थी।
राजा ने स्नान के बाद चर्म रोग से पाई मुक्ति, पुत्र प्राप्ति की भी मान्यता
लोलार्क कुंड से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार पश्चिम बंगाल के कूच बिहार के राजा ने यहां स्नान किया था। मान्यता है कि स्नान के बाद उन्हें चर्म रोग से मुक्ति मिली और बाद में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इसी कथा से लोलार्क कुंड और संतान प्राप्ति की कामना से जुड़े धार्मिक विश्वास को बल मिलता है।
इसी आस्था के कारण लोलार्क छठ के दिन देश के अलग-अलग हिस्सों से दंपती काशी पहुंचते हैं और लोलार्क कुंड में स्नान करने के बाद लोलार्केश्वर महादेव का दर्शन-पूजन करते हैं।