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MLC Election 2026 : शिक्षकों के हक की लड़ाई लड़ने चुनावी मैदान में उतरी ऋतिका दूबे, बोलीं- 23 अक्टूबर को सही नेतृत्व चुनें

 

वाराणसी। वाराणसी खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से माध्यमिक वित्तविहीन शिक्षक महासभा की अधिकृत प्रत्याशी ऋतिका दूबे ने कहा है कि वह शिक्षकों की समस्याओं को सदन तक पहुंचाने और उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने के उद्देश्य से चुनाव मैदान में उतरी हैं। उन्होंने शिक्षकों से 23 अक्टूबर को होने वाले मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने और सही नेतृत्व चुनने की अपील की। उनका कहना है कि यह चुनाव केवल किसी प्रत्याशी को जिताने का नहीं, बल्कि शिक्षक हितों की रक्षा और शिक्षक संगठनों को मजबूत बनाए रखने का भी है।

मंगलवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में ऋतिका दूबे ने कहा कि पिछले कुछ चुनावों से राजनीतिक दलों की सक्रियता शिक्षक निर्वाचन में बढ़ी है। राजनीतिक दलों के पास संसाधन और धनबल हो सकता है, लेकिन शिक्षकों की सबसे बड़ी ताकत उनकी एकजुटता और समझ है। शिक्षक बुद्धिजीवी वर्ग से आते हैं और अपने हितों को अच्छी तरह समझते हैं। ऐसे में उन्हें यह तय करना होगा कि उनकी समस्याओं को सदन में प्रभावी ढंग से कौन उठा सकता है।

महिला शिक्षिकाओं से मतदान की अपील

ऋतिका दूबे ने महिला शिक्षिकाओं की भागीदारी पर जोर देते हुए कहा कि प्रदेश के शिक्षा विभाग में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 45 प्रतिशत है। ऐसे में महिला शिक्षिकाओं की भूमिका इस चुनाव में काफी महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि वह आठ जिलों में जाकर शिक्षकों से संपर्क कर रही हैं और अपने मुद्दों को उनके सामने रख रही हैं।

उन्होंने कहा कि एक महिला प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ना चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन शिक्षकों और शिक्षिकाओं के सहयोग से उन्हें आगे बढ़ने का भरोसा है। उन्होंने महिला शिक्षिकाओं से अपील की कि वे 23 अक्टूबर को मतदान केंद्र पहुंचकर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करें और अपने अधिकारों तथा भविष्य से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दें।

समान काम का समान वेतन और पुरानी पेंशन प्रमुख मुद्दे

वित्तविहीन शिक्षकों की आर्थिक स्थिति को लेकर ऋतिका दूबे ने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि समान काम करने के बावजूद शिक्षकों के वेतन में बड़ा अंतर है। जहां कुछ शिक्षकों को एक लाख रुपये तक वेतन मिलता है, वहीं वित्तविहीन विद्यालयों में पढ़ाने वाले कई शिक्षकों को पांच हजार, छह हजार, दस हजार या 15 हजार रुपये में काम करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि उनकी पहली प्राथमिकता समान काम के लिए समान वेतन की मांग को मजबूती से उठाना है। इसके अलावा वित्तविहीन शिक्षकों के लिए सेवा सुरक्षा नियमावली बनवाने और पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की मांग को भी सदन में उठाने का प्रयास करेंगी।

ऋतिका दूबे ने मदरसों में नियुक्तियों पर लगी रोक हटाने और संस्कृत विद्यालयों, मदरसों के साथ सीबीएसई व आईसीएसई बोर्ड से जुड़े शिक्षकों को भी चिकित्सा सुविधाओं का लाभ दिलाने की जरूरत बताई। उनका कहना है कि शिक्षकों के बीच वेतन, सेवा सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर भेदभाव नहीं होना चाहिए। सभी शिक्षकों को समान अधिकार और जरूरी सुविधाएं मिलनी चाहिए। उन्होंने वेतन से जुड़े लंबित मुद्दों का जिक्र करते हुए कहा कि वर्ष 1986 से भी वेतन संबंधी मांगें उठती रही हैं।

शिक्षक संगठनों को एकजुट करने पर जोर

ऋतिका दूबे ने कहा कि शिक्षक संगठन पिछले करीब दो दशकों से अलग-अलग गुटों में बंटे हुए हैं। इसका असर शिक्षकों के अधिकारों और मांगों की लड़ाई पर पड़ा है। उनके मुताबिक, संगठनों की एकजुटता कमजोर होने से शिक्षकों की आवाज भी कमजोर पड़ती है। ऐसे में शिक्षक संगठनों को मजबूत बनाना जरूरी है, ताकि सरकार के सामने उनकी समस्याओं को प्रभावी तरीके से रखा जा सके।

उन्होंने कहा कि यदि शिक्षक एकजुट नहीं हुए तो राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ सकता है और शिक्षक संगठनों का अस्तित्व कमजोर पड़ सकता है। इसलिए शिक्षकों को अपने हितों को ध्यान में रखते हुए नेतृत्व का चुनाव करना चाहिए।

अफवाहों से पीछे हटने वाली नहीं हैं ऋतिका दूबे

नामांकन नहीं करने, पर्चा वापस लेने और किसी अन्य प्रत्याशी को समर्थन देने जैसी चर्चाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए ऋतिका दूबे ने कहा कि इस तरह की बातें उनका मनोबल कमजोर करने के लिए फैलाई गईं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह चुनाव मैदान में डटी हुई हैं और शिक्षकों के मुद्दों को लेकर पीछे हटने वाली नहीं हैं।

अन्य प्रत्याशियों के राजनीतिक दलों से जुड़ाव पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षक हितों की लड़ाई को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। अंत में उन्होंने शिक्षकों से अपील की कि 23 अक्टूबर को छुट्टी समझकर घर पर न रहें, बल्कि मतदान केंद्र पहुंचकर अपने मताधिकार का प्रयोग करें। उन्होंने कहा कि ऐसा नेतृत्व चुना जाना चाहिए, जो शिक्षकों की समस्याओं को सदन