Nati Imli Bharat Milap : 14 वर्षों के वनवास के बाद हुआ चारों भाई का मिलन, सजल हुए नयन
वाराणसी। काशी के लक्खा मेलों में शुमार विश्व प्रसिद्ध नाटी इमली का भरत मिलाप देखने के लिए guruwar को जनसैलाब उमड़ पड़ा। हर साल की तरह इस वर्ष भी जैसे ही शाम के 4 बजकर 40 मिनट हुए श्रीराम और लक्षमण भाई भरत और शत्रुघ्न से मिलने के लिए लीलास्थल दौड़ पड़े। भाइयों के इस मिलाप को देखकर लाखों की तादात में उमड़े लोगों की आंखे सजल हो गई पूरा इलाका राजा रामचंद्र की जय से गुंजायमान हो गया।
शाही सवारी के साथ पहुंचे काशी नरेश
इसके पहले अपनी शाही सवारी पर सवार होकर महाराज कुंवर अनंत नारायण सिंह लीला स्थल पहुंचे और देव स्वरूपों को दर्शन दिया। इसके बाद उन्होंने देव स्वरूपों को सोने की गिन्नी भेंट स्वरुप प्रदान की और वहीं रूककर लीला को देखा और वहां से रवाना हो गए।
14 वर्ष के वनवास बाद श्रीराम पहुंचे नाटी इमली मैदान
चित्रकूट की रामलीला में परंपरा अनुसार आश्विन शुक्ल एकादशी को भरत मिलाप का आयोजन हुआ। 14 वर्ष के वनवास के दौरान भगवान राम दशानन का वध करने के बाद अयोध्या की ओर लौटते हैं. पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ पुष्पक विमान पर सवार होकर मर्यादा पुरुषोत्तम गुरुवार को दोपहर बाद पौने चार बजे नाटी इमली स्थित भरत मिलाप मैदान पर पहुंचे।
भरत के प्रण की श्रीराम ने रखी लाज
भगवान हनुमान ने प्रभु के आने की सूचना अयोध्या में भरत और शत्रुघन को दे दी। सूचना मिलते ही दोनों अनुज राम लीला मैदान बड़ा गणेश से नंगे पांव दौड़ते हुए नाटी इमली के भरत मिलाप मैदान पर पहुंचे। वहां पहुंचने के बाद भगवान को देख दोनों भाई साष्टांग करते हैं.भरत के प्रण के अनुसार अगर सूर्यास्त से पहले श्रीराम नहीं मिले तो मैं प्राण त्याग दूंगा.इसको देखते हुए भगवान भी सूर्यास्त से पहले अपने अनुज से मिलने के लिए पहुंच जाते हैं।
यादव बंधुओं ने उठाया पुष्पक विमान
एक ओर लीला हो रही थी पीछे मंच पर मानस मंडल के प्रेमी चौपाइयों का पाठ कर रहे थे। आयोजकों द्वारा रामदरबार की आरती उतारी गई। इसके बाद करीब 483 सालों की परंपरा के अनुसार यदुवंशियों ने पुष्पक विमान को कंधे पर उठाया और अयोध्या के लिए रवाना हो गया।
मेघा भगत से जुड़ी मान्यता
इस भरत मिलाप (Nati Imli Bharat Milap) का इतिहास करीब 483 साल पुराना है। मान्यता है कि तुलसीदास के समकालीन मेघा भगत को भगवान श्रीराम ने इसी स्थल पर दर्शन दिए थे। तुलसीदास के शरीर त्याग के बाद जब वे विचलित हुए, तो स्वप्न में तुलसीदास ने उन्हें भरत मिलाप की परंपरा शुरू करने की प्रेरणा दी। तभी से यह लीला हर साल आयोजित की जा रही है, जो अब केवल भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध हो चुकी है।