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मांस-मछली की दुकानों के विस्थापन पर वाराणसी में विरोध प्रदर्शन, साझा संस्कृति मंच ने DM को सौंपा ज्ञापन

वाराणसी में मांस, मछली और मुर्गा दुकानों को शहर से बाहर स्थानांतरित करने की योजना के खिलाफ ‘साझा संस्कृति मंच’ ने विरोध प्रदर्शन किया। मंच ने इसे गरीब व्यापारियों, मल्लाह समुदाय और बनारस की साझा सांस्कृतिक विरासत पर हमला बताते हुए प्रशासन को ज्ञापन सौंपा।

 

वाराणसी: शहर में मांस, मछली और मुर्गा दुकानों को शहरी क्षेत्र से बाहर स्थानांतरित करने की प्रस्तावित योजना को लेकर विरोध तेज हो गया है। गुरुवार को ‘साझा संस्कृति मंच’ के बैनर तले विभिन्न सामाजिक संगठनों, व्यापारियों और नागरिकों ने जिला मुख्यालय पहुंचकर प्रदर्शन किया और जिलाधिकारी को संबोधित ज्ञापन एसडीएम शिवानी सिंह को सौंपा।

मंच ने आरोप लगाया कि स्वच्छता और सुंदरीकरण के नाम पर लिया जा रहा यह फैसला हजारों छोटे व्यापारियों, मल्लाह समुदाय, बंगाली समाज और पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े परिवारों की आजीविका पर सीधा असर डालेगा।

बिना संवाद के लिया गया फैसला, व्यापारियों में नाराजगी

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि दुकानों को शहर से 5 से 10 किलोमीटर दूर स्थानांतरित करने की योजना बिना किसी व्यापक जनपरामर्श के बनाई गई है। उनका आरोप है कि संबंधित व्यापारियों और स्थानीय समुदायों को विश्वास में लिए बिना इस तरह का फैसला लेना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

मंच के प्रतिनिधियों ने कहा कि यदि मांस और मछली की दुकानों को दूर क्षेत्रों में भेज दिया जाता है तो इससे व्यापार लगभग ठप हो जाएगा और हजारों परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा।

बनारस की साझा संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा है मुद्दा

साझा संस्कृति मंच ने कहा कि यह केवल व्यापार का विषय नहीं बल्कि बनारस की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा मुद्दा है। मंच के अनुसार मल्लाह समुदाय की बड़ी आबादी मछली पकड़ने और बेचने के व्यवसाय पर निर्भर है। वहीं शहर में रहने वाले बंगाली समाज के खान-पान और धार्मिक परंपराओं में भी मछली का विशेष महत्व है।


स्वच्छता के नाम पर विस्थापन नहीं, नियमन हो

सांझा संस्कृति मंच ने कहा कि वे स्वच्छता अभियान के विरोधी नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि प्रशासन को खुले में मांस काटने या कचरा प्रबंधन को लेकर चिंता है तो उसका समाधान दुकानों को उजाड़ना नहीं बल्कि आधुनिक नियम लागू करना होना चाहिए।

मंच ने सुझाव दिया कि नगर निगम दुकानों में रेफ्रिजरेशन व्यवस्था, बंद या रंगीन शीशों का उपयोग, वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन और नियमित निरीक्षण जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य करे, ताकि स्वच्छता भी बनी रहे और व्यापार भी प्रभावित न हो।

कॉर्पोरेट हितों को लेकर भी उठे सवाल

ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया कि छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई की बात की जा रही है, जबकि बड़े होटल, मॉल और ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म के माध्यम से मांसाहारी उत्पादों की बिक्री निर्बाध जारी है। मंच का दावा है कि यदि नीति बनाई जाती है तो वह सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि गरीब और पारंपरिक व्यापारियों को निशाना बनाकर किसी भी प्रकार का भेदभावपूर्ण कदम स्वीकार नहीं किया जाएगा।


साझा संस्कृति मंच ने प्रशासन से मांग की है कि प्रस्तावित विस्थापन योजना पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए और संबंधित पक्षों के साथ संवाद स्थापित किया जाए। मंच ने चेतावनी दी कि यदि रोजगार और भोजन की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई तो भविष्य में व्यापक जन आंदोलन किया जाएगा।

जिला मुख्यालय पर आयोजित प्रदर्शन और ज्ञापन कार्यक्रम में सतीश सिंह, रामजन्म यादव, डॉ. अनूप श्रमिक, संजीव सिंह, विनय राय ‘मुन्ना’, शाहिद जमाल, सलमा, नीति, गौतम, ध्रुव, ओमप्रकाश मिश्रा, मनीष शर्मा, डॉ. छेदी लाल निराला समेत बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक शामिल रहे।