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स्क्रब टाइफस को लेकर अलर्ट, BHU में एक सप्ताह में 12 मरीज भर्ती; जल्द जारी होगी एडवाइजरी
 

 

वाराणसी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्क्रब टाइफस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। वाराणसी स्थित सर सुंदरलाल अस्पताल, बीएचयू में पिछले एक सप्ताह के दौरान स्क्रब टाइफस से संक्रमित 12 मरीज भर्ती हुए हैं। इनमें से एक मरीज को उपचार के बाद डिस्चार्ज किया जा चुका है। मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए बीएचयू का जनरल मेडिसिन विभाग जल्द ही इस बीमारी को लेकर एडवाइजरी जारी करने की तैयारी में है।

अस्पताल के एमएस डॉ. पुनीत के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में 12 स्क्रब टाइफस मरीज अस्पताल में भर्ती हुए हैं। बीएचयू के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025 में 2,790 संदिग्ध मरीजों की जांच की गई थी, जिनमें 493 लोगों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। यह संख्या करीब 19 प्रतिशत रही। वहीं, वर्ष 2024 में जून से दिसंबर के बीच 2,512 संदिग्ध मरीजों की जांच में 481 मामले पॉजिटिव मिले थे, जो करीब 17 प्रतिशत है।

बीएचयू में आने वाले संक्रमित मरीज सिर्फ पूर्वांचल से ही नहीं, बल्कि बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और झारखंड से भी पहुंच रहे हैं। माइक्रोबायोलॉजी विभाग के शोध में भी इस बीमारी को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। बढ़ते मामलों को देखते हुए कई डॉक्टरों ने अपनी ओपीडी में मरीजों और उनके परिजनों की काउंसलिंग शुरू कर दी है।

बच्ची की मौत के बाद जांच टीम गठित

सीएमओ डॉ. एनपी सिंह ने बताया कि 17 अगस्त को स्क्रब टाइफस से पीड़ित एक बच्ची की मौत हो गई थी। परिजनों ने अस्पताल पर लापरवाही का आरोप लगाया था। इसके बाद मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय टीम गठित की गई।

जांच टीम में नोडल अधिकारी पंजीयन डॉ. अजय कुमार सिंह, जिला सर्विलांस अधिकारी डॉ. शिशिर कुमार और जिला मलेरिया अधिकारी शरतचंद्र पांडेय शामिल थे। जांच में प्रकाश पैथोलॉजी लैब की रिपोर्ट में बच्ची के स्क्रब टाइफस से संक्रमित होने की पुष्टि हुई।

सीएमओ के मुताबिक वर्ष 2025 में जिले में 91 मामले सामने आए थे, जबकि वर्ष 2026 में जनवरी से अब तक 23 मरीजों की पहचान हो चुकी है। जिले के लगभग सभी ब्लॉकों में एक-दो मामले दर्ज किए गए हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम लगातार निगरानी और जांच कर आवश्यक कार्रवाई कर रही है।

जीवाणु से होती है बीमारी, चिगर माइट से फैलता है संक्रमण

स्क्रब टाइफस ओरिएंटिया त्सुत्सुगामुशी नामक जीवाणु से होने वाली बीमारी है। इसका संक्रमण झाड़ियों, घास-फूस और खेतों में पाए जाने वाले चिगर माइट यानी लाल कीट के काटने से फैलता है। किसान, खेतिहर मजदूर और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग इसके ज्यादा जोखिम में रहते हैं।

बीमारी के शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द और शरीर में दर्द शामिल हैं। इसके लक्षण डेंगू और वायरल फीवर जैसे होने के कारण कई बार शुरुआती चरण में इसकी पहचान मुश्किल हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बुखार रहने पर स्क्रब टाइफस की जांच को भी ध्यान में रखना चाहिए।

आईजीएम एलिसा टेस्ट उपलब्ध होने से अब बीमारी की समय पर पहचान संभव हो रही है। हालांकि, गंभीर मरीजों के इलाज को लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं पर दबाव भी बढ़ रहा है। बीएचयू के बाल रोग विभाग में उपलब्ध 18 वेंटिलेटर पूरी तरह भरे हुए बताए जा रहे हैं। वहीं, जिलास्तरीय अस्पताल में संक्रामक बीमारियों के मरीजों के लिए अलग वार्ड की सुविधा नहीं होने से गंभीर मरीजों के उपचार को लेकर चिंता बनी हुई है।

देश में 1938 में सामने आया था वैज्ञानिक विवरण

भारत को त्सुत्सुगामुशी ट्रायंगल क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है। देश में इस बीमारी का पहला वैज्ञानिक विवरण वर्ष 1938 में कुमाऊं क्षेत्र से सामने आया था, जबकि उत्तर प्रदेश में वर्ष 1945 में इसकी पुष्टि हुई थी। वर्ष 2012 में राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र ने देश के कई राज्यों में स्क्रब टाइफस के प्रकोप की जानकारी दी थी।