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टाउनहॉल में गूंजा काशी का सुर और रंग, ‘काशिका’ के पहले आयोजन ने दर्शकों को किया मंत्रमुग्ध

 

Varanasi : हिन्दी दिवस की पूर्वसंध्या पर काशी की सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा देने वाली पहल ‘काशिका’ (राग और रंग का नियमित उत्सव) का शुभारंभ रविवार को टाउनहॉल स्थित ऐतिहासिक अल्फ़्रेड प्रेक्षागृह में हुआ। जिला पर्यटन एवं संस्कृति परिषद, नगर निगम तथा नागरीप्रचारिणी सभा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में साहित्य, नाट्य और शास्त्रीय संगीत का अद्भुत संगम देखने को मिला।

कार्यक्रम का शुभारंभ नागरीप्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल, संगीत मर्मज्ञ विश्वंभर नाथ मिश्र, धर्मेंद्र सिंह, पंडित कामेश्वर नाथ मिश्र, महापौर अशोक कुमार तिवारी और नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल सहित अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। वैदिक मंगलाचरण के बीच प्रेक्षागृह शास्त्रीय और सात्विक वातावरण से सराबोर हो उठा।

कार्यक्रम का संचालन सौरभ चक्रवर्ती ने किया। उन्होंने ‘काशिका’ की पहल के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका लक्ष्य काशी की विस्मृत होती रंगमंचीय और संगीत परंपराओं को पुनर्जीवित करना है। स्वागत वक्तव्य में व्योमेश शुक्ल ने अल्फ़्रेड हॉल की ऐतिहासिक महत्ता और सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख किया।

काशी की संगीत परंपरा को संरक्षित करने पर जोर

संगीत मर्मज्ञ विश्वंभर नाथ मिश्र ने काशी की विलुप्त होती सांस्कृतिक विरासत को नया आयाम देने की आवश्यकता पर जोर दिया। वहीं महापौर अशोक कुमार तिवारी ने काशी की संगीत और नाट्य परंपरा के विभिन्न पक्षों पर चर्चा की।

उन्होंने संकटमोचन संगीत समारोह, कजरी, ठुमरी और चैती जैसी विधाओं के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि काशी की पहचान केवल मंदिरों, गंगा आरती और धार्मिक पर्यटन तक सीमित नहीं है। बिस्मिल्लाह खां की शहनाई, कबीर चौरा की संगीत परंपरा और यहां के महान संगीत साधकों की विरासत भी काशी की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

महापौर ने कहा कि संगीत केवल सुना नहीं जाता, बल्कि साधा और महसूस किया जाता है। उन्होंने नगर निगम की ओर से ‘काशिका’ को निरंतर सहयोग देने का आश्वासन देते हुए काशी की संगीत संध्याओं और नाट्य परंपरा को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया।

धर्मेंद्र सिंह ने संगीत को जीवन का रसायन बताते हुए काशी को तुलसी, कबीर और रैदास की सांस्कृतिक भूमि बताया। कार्यक्रम के दौरान सभी अतिथियों को अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।

‘राम की शक्तिपूजा’ की नृत्य-नाटिका ने बांधा समां

कार्यक्रम के रंग-सत्र में महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कालजयी काव्य-कृति ‘राम की शक्तिपूजा’ पर आधारित नृत्य-नाटिका प्रस्तुत की गई। रूपवाणी द्वारा प्रस्तुत यह नृत्य-नाटिका देश के विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर मंचित की जा चुकी है। अल्फ़्रेड प्रेक्षागृह में इसका 140वां मंचन हुआ।

मंचन से पूर्व व्योमेश शुक्ल ने काव्य-कृति की पृष्ठभूमि और शक्ति आराधना के महत्व पर प्रकाश डाला। इसके बाद कलाकारों ने श्रीराम के अंतर्द्वंद्व, शक्ति साधना और रावण पर विजय के विश्वास को नृत्य, भाव-भंगिमाओं तथा प्रकाश-छाया के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

कथक, भरतनाट्यम और अन्य नृत्य शैलियों के समन्वय से तैयार प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। ‘अन्याय जिधर, उधर है शक्ति’ और ‘आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर’ जैसे प्रसंगों पर दर्शक दीर्घा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी। वहीं ‘होगी जय होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन’ की प्रस्तुति ने दर्शकों में विशेष उत्साह पैदा किया।

साजन मिश्र और स्वरांश मिश्र की जुगलबंदी ने मोहा मन

रंग-सत्र के बाद राग-सत्र में बनारस घराने की शास्त्रीय संगीत परंपरा का प्रभावशाली स्वराभिषेक हुआ। पद्मभूषण पंडित साजन मिश्र और उनके पुत्र स्वरांश मिश्र ने जुगलबंदी गायन प्रस्तुत कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

पिता-पुत्र की इस प्रस्तुति में पंडित साजन मिश्र की साधना और अनुभव के साथ स्वरांश मिश्र की ताजगी और ओज का सुंदर समन्वय देखने को मिला। आलाप, तानों और भावपूर्ण बंदिशों ने पूरे सभागार को रससिक्त कर दिया।

संगत कलाकारों में संवादिनी पर पंडित धर्मनाथ मिश्र तथा तबले पर राजेश कुमार मिश्र ने प्रभावशाली सहयोग दिया। पंडित साजन मिश्र ने कहा कि भाव की अभिव्यक्ति साहित्य से संभव होती है और संगीत शब्दों को सुर प्रदान करता है। उन्होंने बनारस की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां लोग पेट भर खाते हैं और जी भर गाते हैं।

जुगलबंदी में राग सहाना के माध्यम से राधा-कृष्ण के प्रेम, उत्तर प्रदेश के लोकगीतों तथा विवाह संस्कारों से जुड़ी संगीत परंपरा को प्रस्तुत किया गया। उन्होंने बताया कि इस राग का प्रभाव हिंदू और मुस्लिम दोनों सांस्कृतिक परंपराओं में रहा है।

कार्यक्रम के दौरान भक्ति और शृंगार, सगुण और निर्गुण जैसे आध्यात्मिक विषयों पर भी संवाद हुआ। पंडित साजन मिश्र ने कहा कि भक्ति से ही शृंगार का सृजन होता है तथा सगुण और निर्गुण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

इन्हीं विचारों और प्रस्तुतियों के साथ ‘काशिका’ का प्रथम साप्ताहिक कार्यक्रम संपन्न हुआ। आयोजन ने काशी की नाट्य, साहित्यिक और संगीत परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल का संदेश दिया।