महालक्ष्मी मंदिर में दर्शन को उमड़ी भीड़, सुबह से भक्तों की कतार, सोरहिया मेले के अंतिम दिन श्रद्धालुओं ने मांगा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद
वाराणसी: लक्सा स्थित लक्ष्मीकुंड के महालक्ष्मी मंदिर में सोरहिया मेले के अंतिम चरण में शुक्रवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। सुबह से ही मंदिर में दर्शन के लिए भक्त पहुंचने लगे। कतार में लगकर लोगों ने मां महालक्ष्मी के दर्शन किए और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
सोरहिया मेला काशी की पुरानी धार्मिक परंपराओं में शामिल है। इस दौरान महिलाएं मां महालक्ष्मी और माता जिउतिया की पूजा करती हैं। संतान की दीर्घायु, परिवार की खुशहाली और सुख-समृद्धि की कामना को लेकर बड़ी संख्या में महिलाएं व्रत रखती हैं।
सुबह से मंदिर में लगी श्रद्धालुओं की कतार
मेले के अंतिम दिन लक्ष्मीकुंड स्थित महालक्ष्मी मंदिर में सुबह से ही दर्शन के लिए श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। भक्त कतार में अपनी बारी का इंतजार करते रहे। दर्शन के बाद लोगों ने मां लक्ष्मी से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की।
महिलाओं की संख्या भी काफी अधिक रही। कई महिलाएं निर्धारित व्रत के साथ मंदिर पहुंचीं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। सोरहिया व्रत के दौरान 16 की संख्या का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा में 16 गांठ वाला धागा, 16 परिक्रमा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा है।
संतान की दीर्घायु और परिवार की खुशहाली की कामना
सोरहिया मेले में महिलाओं की धार्मिक आस्था प्रमुख रूप से संतान की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ी है। व्रत रखने वाली महिलाएं महालक्ष्मी और जिउतिया माता की पूजा करती हैं और कथा का श्रवण करती हैं।
मेले के दौरान लक्ष्मीकुंड और आसपास का क्षेत्र धार्मिक गतिविधियों से गुलजार रहता है। मंदिर में दर्शन-पूजन के साथ श्रद्धालु यहां की पारंपरिक मान्यताओं और अनुष्ठानों में भी हिस्सा लेते हैं।
क्या है सोरहिया मेले की परंपरा?
सोरहिया मेले की परंपरा राजा जीउतवाहन की कथा से जुड़ी बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, संतान प्राप्ति और समृद्धि की कामना से राजा ने मां लक्ष्मी की आराधना की थी। मां लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर उन्हें व्रत का विधान बताया। इसी परंपरा से सोरहिया व्रत की मान्यता जुड़ी मानी जाती है।
मेला सामान्य तौर पर 16 दिनों की धार्मिक परंपरा से जुड़ा है। इस दौरान महिलाएं नियमित रूप से पूजा-अर्चना करती हैं और मां लक्ष्मी को शृंगार सामग्री सहित विभिन्न पूजन सामग्री अर्पित करती हैं।
4 अक्टूबर को होगा महालक्ष्मी का शृंगार महोत्सव
इस वर्ष तिथियों में बदलाव के कारण सोरहिया व्रत की अवधि में भी परिवर्तन हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस बार व्रत 15 दिनों का रहेगा और 3 अक्टूबर को इसका प्रमुख व्रत पड़ रहा है। इसके बाद 4 अक्टूबर को महालक्ष्मी का शृंगार महोत्सव आयोजित किया जाएगा।
सोरहिया मेले के अंतिम चरण में उमड़ी भीड़ से एक बार फिर साफ दिखा कि काशी की धार्मिक परंपराओं में लक्ष्मीकुंड स्थित महालक्ष्मी मंदिर की विशेष आस्था है। मेले के दौरान हजारों श्रद्धालुओं का पहुंचना इसी धार्मिक परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है।