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काशी में देवदीपावली को वैश्विक पहचान दिलाने वाले वागीशदत्त मिश्र का निधन

काशी की देवदीपावली को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले वागीशदत्त मिश्र का रविवार रात निधन हो गया। करीब 57 वर्षीय वागीश बीमारी के बावजूद देवदीपावली 2026 की तैयारियों में जुटे थे। उन्होंने घाटों से कुंडों और तालाबों तक आयोजन का विस्तार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

वाराणसी: काशी की देवदीपावली को घाटों से आगे बढ़ाकर देश-दुनिया में पहचान दिलाने के लिए जीवनभर प्रयास करने वाले वागीशदत्त मिश्र का रविवार रात निधन हो गया। करीब 57 वर्षीय वागीशदत्त पिछले कुछ दिनों से बीमार थे। तबीयत बिगड़ने पर परिजन उन्हें कबीरचौरा अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उपचार के दौरान रात करीब नौ बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। बीमारी के बावजूद वह आगामी देवदीपावली उत्सव की तैयारियों में जुटे हुए थे।

उनके निधन की खबर से काशी में शोक की लहर दौड़ गई। उनके करीबी और शुभचिंतक पहले तो इस खबर पर विश्वास नहीं कर सके। लोग एक-दूसरे से संपर्क कर निधन की सूचना की पुष्टि करते रहे। वागीशदत्त मिश्र का जाना काशी की उस परंपरा से जुड़े एक ऐसे व्यक्ति का जाना है, जिसने जनसहयोग के दम पर देवदीपावली के विस्तार में अहम भूमिका निभाई।

बीमारी के बीच भी देवदीपावली की तैयारियों में जुटे थे

वागीशदत्त मिश्र की तबीयत पिछले कुछ दिनों से खराब चल रही थी। इसके बावजूद देवदीपावली की तैयारियों को लेकर उनकी सक्रियता कम नहीं हुई थी। उन्होंने हाल ही में आयोजन की विभिन्न उप समितियों के पदाधिकारियों के साथ ऑनलाइन बैठक की थी।

अस्वस्थ होने के कारण वह बैठक में ज्यादा बोल नहीं पा रहे थे, लेकिन पूरे समय जुड़े रहे। उन्होंने उप समितियों की समस्याओं की सूची तैयार कर जिला प्रशासन को जल्द उपलब्ध कराने का निर्देश भी अपने साथियों को दिया था। उनके लिए देवदीपावली केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक पहचान और जनभागीदारी से जुड़ा अभियान था।

पंचगंगा घाट से शुरू हुआ विस्तार का सफर

काशी में देवदीपावली के आयोजन की शुरुआत पंचगंगा घाट पर हुई थी। अस्सी के दशक में तीसरी बार इस आयोजन के शुरू होने के बाद से ही वागीशदत्त मिश्र किशोरावस्था में इसके विस्तार के लिए प्रयास करने लगे थे।

उन्होंने अपने कुछ करीबी मित्रों के साथ मिलकर पांच घाटों तक देवदीपावली के आयोजन का विस्तार किया। इसके बाद उन्होंने इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम किया। उनके प्रयासों से देवदीपावली का आयोजन गंगा के घाटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर के अन्य धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों तक भी पहुंचा।

कुंडों और तालाबों तक पहुंचाई देवदीपावली

वागीशदत्त मिश्र की पहल पर वर्ष 2000 से काशी के कुंडों और तालाबों पर भी देवदीपावली मनाने की शुरुआत हुई। इससे इस आयोजन का दायरा और व्यापक हुआ तथा शहर के अलग-अलग हिस्सों में लोगों की भागीदारी बढ़ी।

उनकी कोशिश थी कि देवदीपावली केवल प्रमुख घाटों तक सीमित न रहे, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े दूसरे जलाशय और स्थल भी इस उत्सव का हिस्सा बनें।

करीब एक दशक पहले उन्होंने गंगोत्री से गंगासागर तक यात्रा कर गंगा किनारे बसे 52 शहरों में देवदीपावली के आयोजन की शुरुआत कराने में भी भूमिका निभाई। इस तरह काशी की परंपरा को गंगा के व्यापक सांस्कृतिक क्षेत्र से जोड़ने का प्रयास किया गया।

सरकारी फरमानों के खिलाफ भी खड़े रहे

देवदीपावली के आयोजन को लेकर जब भी ऐसे सरकारी आदेश जारी हुए, जिन्हें वागीशदत्त मिश्र उत्सव के हित में नहीं मानते थे, उन्होंने उनका विरोध किया। वह जनसहयोग के माध्यम से आयोजन की परंपरा को बनाए रखने के पक्षधर रहे।

उनका मानना था कि देवदीपावली की असली ताकत आम लोगों की भागीदारी में है। घर-घर जाकर तेल, बाती और दीये जुटाने से लेकर आयोजन के विस्तार तक, उन्होंने लोगों को इस उत्सव से जोड़ने का लगातार प्रयास किया।

देवदीपावली को प्रांतीय मेले का दर्जा दिलाने में अहम भूमिका

वागीशदत्त मिश्र के वर्षों के प्रयासों और जनसहयोग से देवदीपावली का स्वरूप लगातार व्यापक होता गया। तीन वर्ष पहले प्रदेश सरकार ने देवदीपावली को प्रांतीय मेले का दर्जा दिया था। इस मुकाम तक आयोजन को पहुंचाने में उनके लंबे प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

उनके निधन के समय भी आगामी देवदीपावली की तैयारियां चल रही थीं। बीमारी की हालत में भी आयोजन की व्यवस्थाओं और उप समितियों की समस्याओं पर उनका ध्यान बना हुआ था।