क्या है कांवड़ यात्रा का वास्तविक महत्व? काशी के ज्योतिषाचार्य ने बताया इसका पौराणिक रहस्य
वाराणसी। सनातन धर्म में श्रावण (सावन) का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। वर्ष 2026 में सावन माह की शुरुआत 30 जुलाई (गुरुवार) से होगी और इसका समापन 28 अगस्त (शुक्रवार) को श्रावण पूर्णिमा एवं रक्षाबंधन के साथ होगा। इस बार पूरे सावन में चार सोमवार पड़ेंगे, जिन्हें शिवभक्तों के लिए विशेष फलदायी माना जाता है।
सावन के आगमन के साथ ही देशभर में कांवड़ यात्रा का उत्साह चरम पर पहुंच जाता है। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी और गंगोत्री से लेकर रामेश्वरम् तक शिवभक्त "बोल बम" के जयघोष के साथ पवित्र नदियों से जल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। विशेष रूप से शिव की नगरी काशी में भगवा वस्त्रधारी कांवड़ियों की विशाल पदयात्राएं आस्था, अनुशासन और भारतीय संस्कृति की अद्भुत झलक प्रस्तुत करती हैं।
रानी पद्मावती तारा योगतंत्र आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, इंद्रपुर-शिवपुर के प्राचार्य डॉ. कमलेश झा के अनुसार, वर्तमान स्वरूप में "कांवड़" शब्द भले ही पुराणों में प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता, लेकिन पवित्र नदियों से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करने की परंपरा वैदिक और पौराणिक ग्रंथों में स्पष्ट रूप से वर्णित है। आज की कांवड़ यात्रा उसी प्राचीन शिवाभिषेक परंपरा का विकसित स्वरूप मानी जाती है।
उन्होंने बताया कि शिवपुराण और लिंगपुराण में जलाभिषेक को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। शिवलिंग पर शुद्ध जल या गंगाजल अर्पित करने से पापों का क्षय होता है तथा आयु, आरोग्य, सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से श्रावण मास में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और बेलपत्र अर्पण का धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
डॉ. झा ने बताया कि समुद्र मंथन की पौराणिक कथा भी जलाभिषेक की परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। जब समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष का भगवान शिव ने लोककल्याण के लिए पान किया, तब उनका कंठ नीलवर्ण हो गया। मान्यता है कि भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया। यही परंपरा आज भी श्रद्धालु कांवड़ यात्रा के माध्यम से निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता और सामूहिक आस्था का प्रतीक भी है। करोड़ों श्रद्धालु कठिन पदयात्रा कर गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी और कावेरी जैसी पवित्र नदियों से जल लाकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। यह यात्रा भक्ति, अनुशासन, सेवा और एकता का संदेश देती है।
श्रावण मास को तप, संयम, उपासना और प्रकृति के पुनर्जीवन का भी पर्व माना जाता है। वर्षा ऋतु के इस पावन काल में भगवान शिव की आराधना से आध्यात्मिक उन्नति, मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति होने की मान्यता है। ऐसे में 30 जुलाई से शुरू होने वाला सावन 2026 एक बार फिर शिवभक्तों के लिए आस्था, श्रद्धा और भक्ति का महापर्व बनने जा रहा है।