काशी के लकड़ी के खिलौनों ने दुनिया में बनाई पहचान, शुभी अग्रवाल ने परंपरा को दिया वैश्विक विस्तार
वाराणसी। काशी की प्राचीन गलियों में जन्मी पारंपरिक लकड़ी के खिलौनों की कला आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी अलग पहचान बना चुकी है। कभी स्थानीय बाजारों तक सीमित रहने वाले बनारस के लकड़ी के खिलौने अब जापान, फ्रांस, स्पेन, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे देशों तक पहुंच रहे हैं। इस उपलब्धि के पीछे युवा शिल्प उद्यमी शुभी अग्रवाल की दूरदर्शिता, नवाचार और निरंतर प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
लोलार्क कुंड निवासी शुभी अग्रवाल न केवल अपने पारिवारिक शिल्प व्यवसाय को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रही हैं, बल्कि सैकड़ों महिलाओं और शिल्पकारों को आत्मनिर्भर बनाने का कार्य भी कर रही हैं। उन्होंने वर्ष 2017-18 के बाद बाजार की बदलती मांग को समझते हुए पारंपरिक खिलौनों में आधुनिक और सांस्कृतिक विषयों का समावेश किया। रामायण और महाभारत की कथाओं पर आधारित खिलौनों को विशेष रूप से तैयार किया गया, जिनमें आसमान में उड़ते हनुमान की थीम वाले खिलौनों को देश-विदेश में काफी सराहना मिली।
शुभी का मानना है कि विदेशी पर्यटक भगवान शिव और हनुमान के बारे में तो जानते हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं के अन्य पहलुओं से उन्हें जोड़ने की आवश्यकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने नए डिजाइनों और थीम आधारित उत्पादों का विकास शुरू किया। अब फिशर टॉयज जैसे नए उत्पादों के माध्यम से जापान और फ्रांस के ग्राहकों तक भी पहुंच बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
लकड़ी के खिलौनों की इस विरासत की नींव वर्ष 1958 में शुभी के दादा शशि नारायण अग्रवाल ने रखी थी। इसके बाद वर्ष 1985 में उनके पिता बिहारी लाल अग्रवाल ने इस कला को आगे बढ़ाया। उस समय झुनझुना, सिंदोरा, चटनीदान, फिरंगी और अन्य पारंपरिक लकड़ी के उत्पाद बनाए जाते थे। उस दौर में बाजार मुख्य रूप से स्थानीय था और ग्राहकों में दक्षिण भारतीय तथा बंगाली पर्यटक अधिक होते थे।
वर्ष 1985 के आसपास काशी विश्वनाथ मंदिर आने वाले विदेशी पर्यटकों की बढ़ती संख्या और उनकी पसंद को देखते हुए परिवार ने नए प्रयोग शुरू किए। विदेशी पर्यटक पारंपरिक सिंदोरा जैसे उत्पादों में कम रुचि दिखाते थे, इसलिए हाथी-घोड़े जैसे सजावटी और आकर्षक खिलौनों का निर्माण आरंभ किया गया। आज भी इस शिल्प का लगभग 80 प्रतिशत कार्य हाथों से किया जाता है, जो इसकी विशिष्टता और कलात्मकता को बनाए रखता है।
काशी के लकड़ी के खिलौनों को जीआई टैग प्राप्त होने के बाद इस कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। वर्तमान में शुभी अग्रवाल 32 शिल्पकारों के साथ कार्य कर रही हैं और अब तक 457 महिलाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार एवं आत्मनिर्भरता का अवसर प्रदान कर चुकी हैं। शिल्पकारों को उनके कार्य के अनुसार 200 से 500 रुपये तक पारिश्रमिक दिया जाता है।
उनकी उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है। वर्ष 2024 में केंद्र सरकार की ओर से उन्हें विश्व आर्थिक मंच के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए स्विट्जरलैंड जाने का अवसर मिला, जो उनके कार्य और काशी की पारंपरिक शिल्प कला के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
शुभी अग्रवाल की पहल ने यह साबित कर दिया है कि यदि परंपरा को नवाचार के साथ जोड़ा जाए तो स्थानीय कला और शिल्प को वैश्विक पहचान दिलाई जा सकती है। आज बनारस के लकड़ी के खिलौने न केवल भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, बल्कि दुनिया भर में काशी की सांस्कृतिक विरासत का संदेश भी पहुंचा रहे हैं।