युवा जानते हैं क्या खाना है, फिर भी क्यों खा रहे जंक फूड? BHU की रिसर्च में सामने आई बड़ी वजह
वाराणसी। भारतीय युवा सामान्यतः स्वस्थ और अस्वस्थ भोजन के बीच अंतर समझते हैं, लेकिन बीएचयू के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि स्वस्थ भोजन की जानकारी होना और उसे नियमित रूप से अपनाना दो अलग-अलग बातें हैं। देश के आठ महानगरों में किए गए इस गुणात्मक अध्ययन में पाया गया कि भोजन की कीमत, जंक फूड की आसान उपलब्धता, व्यस्त जीवनशैली, खाना पकाने के सीमित कौशल, सामाजिक प्रभाव और डिजिटल मीडिया युवाओं के खान-पान के फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय, डीकिन यूनिवर्सिटी ऑस्ट्रेलिया और अहमदाबाद विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने मुंबई, पुणे, हैदराबाद, कोलकाता, अहमदाबाद, चेन्नई, दिल्ली और बेंगलुरु के युवा वयस्कों की भोजन संबंधी धारणाओं और स्वस्थ भोजन अपनाने में आने वाली बाधाओं का अध्ययन किया।
अध्ययन में अधिकांश प्रतिभागियों ने फल, सब्जियां, दालें, अनाज और कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को स्वस्थ बताया, जबकि गहरे तेल में तले और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को अस्वस्थ माना। हालांकि, एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि किसी भी प्रतिभागी ने भोजन को स्वस्थ या अस्वस्थ तय करने के लिए पोषण लेबल या स्वास्थ्य संबंधी दावों पर निर्भरता नहीं बताई।
महंगा स्वस्थ भोजन, सस्ता जंक फूड बनी बड़ी बाधा
शोध में भोजन की कीमत स्वस्थ खान-पान अपनाने की सबसे बड़ी बाधाओं में शामिल रही। प्रतिभागियों ने फल और ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों समेत पौष्टिक भोजन को महंगा बताया, जबकि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड और जंक फूड को अपेक्षाकृत सस्ता और आसानी से उपलब्ध विकल्प माना। शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि स्वस्थ भोजन आर्थिक रूप से सुलभ नहीं होगा तो केवल पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा।
समय की कमी से बढ़ रहा रेडी-टू-ईट और ऑनलाइन फूड का चलन
शैक्षणिक और कामकाजी व्यस्तताओं के कारण युवाओं के पास भोजन तैयार करने के लिए पर्याप्त समय नहीं है। खाना पकाने के सीमित कौशल और भोजन बनाने में लगने वाली मेहनत के चलते कई युवा रेडी-टू-ईट भोजन, पहले से तैयार खाद्य पदार्थों और ऑनलाइन फूड डिलीवरी की ओर आकर्षित हो रहे हैं। हालांकि, वे यह मानते हैं कि घर का बना भोजन अधिक स्वस्थ होता है, लेकिन व्यस्त जीवनशैली इसे नियमित रूप से अपनाने में बाधा बन रही है।
दोस्तों का साथ भी बदल रहा खान-पान
अध्ययन में यह भी सामने आया कि युवाओं के भोजन विकल्प केवल उनकी व्यक्तिगत पसंद से तय नहीं होते। दोस्तों और सामाजिक समूह के साथ भोजन करते समय युवा कई बार ऐसे खाद्य पदार्थ भी खा लेते हैं, जिन्हें वे सामान्य परिस्थितियों में पसंद नहीं करते या स्वस्थ नहीं मानते। ऐसे में स्वस्थ भोजन को बढ़ावा देने वाली योजनाओं में व्यक्तिगत इच्छाशक्ति के साथ सामाजिक और भोजन संबंधी वातावरण को भी ध्यान में रखने की जरूरत है।
सरकारी स्वास्थ्य अभियानों की जानकारी सीमित
अध्ययन के दौरान अधिकांश प्रतिभागियों को ‘ईट राइट इंडिया’ और ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ जैसे सरकारी अभियानों की सीमित जानकारी थी। कुछ प्रतिभागियों ने इन अभियानों के नाम पहली बार अध्ययन के दौरान सुने। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह सवाल उठाता है कि स्वास्थ्य अभियानों का संदेश युवाओं तक किस माध्यम से और कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच रहा है। युवाओं के लिए अधिक लक्षित और प्रभावी संचार रणनीतियों की जरूरत है।
सोशल मीडिया बना चुनौती और अवसर दोनों
युवा स्वास्थ्य और पोषण संबंधी जानकारी के लिए तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ प्रतिभागियों ने भोजन और शारीरिक गतिविधियों पर नजर रखने के लिए डिजिटल एप्लीकेशन के इस्तेमाल की जानकारी दी। वहीं, सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों की आकर्षक मार्केटिंग भी लगातार युवाओं तक पहुंच रही है। ऐसे में डिजिटल मीडिया को स्वस्थ जीवनशैली के प्रचार के प्रभावी माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
सिर्फ ‘स्वस्थ खाइए’ कहना पर्याप्त नहीं
शोधकर्ताओं का कहना है कि युवाओं को केवल स्वस्थ भोजन करने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। ऐसा भोजन वातावरण तैयार करना जरूरी है, जहां पौष्टिक भोजन सस्ता, आसानी से उपलब्ध, सुविधाजनक और आकर्षक हो। इसके साथ युवाओं में पोषण साक्षरता, खाद्य लेबल समझने, भोजन चयन, खाना पकाने, भोजन योजना, बजट प्रबंधन और डिजिटल स्वास्थ्य साक्षरता जैसे कौशल विकसित करने की जरूरत है।
बीएमसी पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन को भारत की युवा आबादी के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार, स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में व्यावहारिक खाद्य एवं पोषण शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसमें खाद्य लेबल पढ़ना, कम लागत में पौष्टिक भोजन की योजना बनाना और भोजन तैयार करने जैसे व्यावहारिक कौशल शामिल किए जा सकते हैं।
इसके अलावा छात्रावासों, विश्वविद्यालयों और कार्यस्थलों पर सस्ता, पौष्टिक और आसानी से उपलब्ध भोजन सुनिश्चित करने की दिशा में भी कदम उठाए जा सकते हैं। शोध टीम में गृहविज्ञान विभाग की अध्यक्ष प्रो. ललिता वट्टा, स्नातकोत्तर छात्राएं फरहीन और शिखा, डीकिन यूनिवर्सिटी ऑस्ट्रेलिया के प्रो. एंथनी वार्सली तथा अहमदाबाद विश्वविद्यालय की प्रो. नेहा राठी शामिल थीं।