BRICS में 11 देश साथ, लेकिन एजेंडा अलग-अलग; चीन से भारत और रूस तक क्या है सबका मकसद?
दिल्ली में चल रही BRICS Summit 2026 ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान इस समूह की बढ़ती ताकत पर खींचा है। ब्राजील, रूस, भारत और चीन से शुरू हुआ BRICS अब 11 देशों का बड़ा मंच बन चुका है। समूह में दुनिया की करीब 49.5 फीसदी आबादी रहती है और वैश्विक GDP में इसकी हिस्सेदारी लगभग 40 फीसदी है। इसके बावजूद बड़ा सवाल यही है कि क्या BRICS वास्तव में एक मजबूत ग्लोबल पावर बन सकता है, क्योंकि संगठन के सदस्य देशों के रणनीतिक और आर्थिक हित कई मुद्दों पर एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
BRICS में 11 देश, लेकिन सभी का एजेंडा अलग
BRICS का विस्तार होने के बाद इसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, सऊदी अरब और इंडोनेशिया शामिल हैं। समूह का आकार और आर्थिक क्षमता इसे प्रभावशाली बनाती है, लेकिन सदस्य देशों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं।
चीन BRICS को अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प के तौर पर मजबूत करना चाहता है। इसके जरिए बीजिंग ग्लोबल साउथ में अपना रणनीतिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
इसके विपरीत भारत BRICS को पश्चिम विरोधी गठबंधन के रूप में नहीं देखता। भारत के लिए यह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करने और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की दिशा में काम करने वाला मंच है।
रूस और ईरान को पश्चिम के विकल्प की तलाश
रूस के लिए BRICS की भूमिका अलग है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच मॉस्को इस समूह के जरिए नए व्यापारिक और आर्थिक साझेदार तलाशना चाहता है। साथ ही रूस यह संदेश भी देना चाहता है कि पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग नहीं पड़ा है।
ईरान की प्राथमिकताएं भी कुछ हद तक रूस से मिलती हैं। वह अमेरिकी प्रतिबंधों के विकल्प तलाशने और गैर-पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने पर जोर देता है।
सऊदी अरब और UAE का नजरिया अलग
सऊदी अरब और UAE की स्थिति BRICS के दूसरे कुछ सदस्यों से अलग है। दोनों देश अमेरिका के पुराने रणनीतिक साझेदार माने जाते हैं। ऐसे में BRICS की सदस्यता के जरिए वे अपने कूटनीतिक और आर्थिक विकल्प बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन पश्चिमी देशों से अपने संबंध खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं।
ऊर्जा के लिहाज से महत्वपूर्ण इन देशों के बीच भी क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा को लेकर मतभेद रहे हैं। खासकर सऊदी अरब, ईरान और UAE के अपने-अपने क्षेत्रीय हित हैं। ऐसे में BRICS के भीतर भी सभी देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं।
ब्राजील से अफ्रीकी देशों तक अलग प्राथमिकताएं
ब्राजील BRICS के जरिए विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने और संयुक्त राष्ट्र समेत वैश्विक संस्थाओं में ग्लोबल साउथ को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने पर जोर देता है।
दक्षिण अफ्रीका के लिए अफ्रीकी देशों के हित और निवेश महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। वहीं मिस्र की प्राथमिकता विदेशी निवेश आकर्षित करना है। इथियोपिया इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहता है। इंडोनेशिया भी BRICS को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखते हुए व्यापार और निवेश के नए अवसरों के मंच के रूप में देखता है।
आर्थिक ताकत बड़ी, लेकिन आपसी व्यापार अभी सीमित
आंकड़ों के लिहाज से BRICS काफी बड़ा आर्थिक समूह है। इसकी कुल आबादी G7 की तुलना में कई गुना ज्यादा है। वहीं Purchasing Power Parity यानी PPP के आधार पर वैश्विक GDP में BRICS की हिस्सेदारी G7 से आगे निकल चुकी है।
समूह में चीन और भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। दूसरी तरफ रूस, सऊदी अरब, UAE और ईरान वैश्विक ऊर्जा बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। यही वजह है कि आर्थिक और संसाधन क्षमता के लिहाज से BRICS को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। लेकिन सिर्फ बड़ा आर्थिक आकार किसी समूह को पूरी तरह एकीकृत आर्थिक शक्ति नहीं बना देता।
BRICS देशों के बीच सिर्फ करीब 20 फीसदी व्यापार
BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक सदस्य देशों के बीच सीमित आर्थिक एकीकरण है। UN Trade and Development के आंकड़ों के मुताबिक, BRICS देशों का आपसी व्यापार उनके कुल व्यापार का करीब 20 फीसदी है।
हालांकि, यह आंकड़ा 2003 के मुकाबले लगभग 13 गुना बढ़ चुका है। यानी सदस्य देशों के बीच व्यापारिक संबंध तेजी से बढ़े हैं, लेकिन अभी भी समूह की कुल व्यापार क्षमता का बड़ा हिस्सा BRICS के बाहर होता है।
इसके अलावा चीन की अर्थव्यवस्था और व्यापार क्षमता बाकी कई सदस्य देशों की तुलना में बहुत बड़ी है। इससे समूह के भीतर शक्ति संतुलन का सवाल भी उठता है। छोटे और मध्यम आकार के सदस्य देश नहीं चाहते कि पश्चिमी देशों के प्रभाव की जगह BRICS के भीतर चीन का वर्चस्व स्थापित हो जाए।
डॉलर का विकल्प तलाश रहा BRICS
BRICS के सदस्य देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर पर निर्भरता को कुछ हद तक कम करना है। समूह की प्रमुख उपलब्धियों में New Development Bank भी शामिल है। दिसंबर 2025 तक बैंक ने 139 परियोजनाओं के लिए करीब 42.9 अरब डॉलर की फाइनेंसिंग मंजूर की थी।
यह एक महत्वपूर्ण वित्तीय क्षमता है, लेकिन विश्व बैंक जैसी स्थापित वैश्विक वित्तीय संस्थाओं की तुलना में New Development Bank का आकार अभी काफी छोटा है। अगर BRICS डॉलर के विकल्प को प्रभावी बनाना चाहता है तो सदस्य देशों के बीच करेंसी एक्सचेंज की बेहतर व्यवस्था, भुगतान प्रणाली में सहयोग और मजबूत आर्थिक एकीकरण जरूरी होगा।
ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने पर PM मोदी का जोर
BRICS Summit 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संगठन की भूमिका को लेकर बड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि BRICS को दो दशक पूरे हो चुके हैं और अब इसे परिणाम देने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
प्रधानमंत्री ने ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने और वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया। उनका कहना है कि जरूरत इस बात की है कि ग्लोबल साउथ केवल अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने वाला न रहे, बल्कि नियम बनाने की प्रक्रिया में भी उसकी प्रभावी भूमिका हो।
यही भारत और चीन के BRICS विजन में एक अहम अंतर भी दिखाई देता है। चीन समूह को पश्चिमी नेतृत्व वाली व्यवस्था के विकल्प के रूप में अधिक प्रभावी बनाना चाहता है, जबकि भारत बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था, संस्थागत सुधार और ग्लोबल साउथ की ज्यादा भागीदारी पर जोर देता है।
क्या BRICS बन सकता है ग्लोबल पावर?
BRICS की ताकत को सिर्फ उसकी आबादी या GDP से नहीं मापा जा सकता। समूह के पास बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, विशाल बाजार, ऊर्जा संसाधन और विकासशील देशों का व्यापक प्रतिनिधित्व है। लेकिन सदस्य देशों के बीच राजनीतिक प्राथमिकताओं, सुरक्षा हितों और विदेश नीति में मौजूद अंतर इसकी एकजुटता के सामने बड़ी चुनौती हैं।
अगर BRICS आपसी व्यापार, वित्तीय सहयोग और स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन को मजबूत करने में सफल होता है तो आने वाले वर्षों में इसका वैश्विक प्रभाव काफी बढ़ सकता है। लेकिन इसके लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि चीन के बढ़ते प्रभाव और अलग-अलग सदस्य देशों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।