क्या सिर्फ बजट काफी है? भारत बन सकता है स्किल कैपिटल, लेकिन जमीनी हकीकत अभी भी चुनौतीपूर्ण
भारत की 65% युवा आबादी के बावजूद कौशल विकास पर बजटीय खर्च और ज़मीनी नतीजों में बड़ा अंतर सामने आया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, स्किल ट्रेनिंग की धीमी रफ्तार भारत के ‘स्किल कैपिटल’ बनने की राह में सबसे बड़ी चुनौती है।
भारत की करीब 65 प्रतिशत आबादी युवा है। यही वजह है कि देश को वैश्विक स्तर पर ‘स्किल कैपिटल’ बनने की प्रबल संभावना वाला माना जाता है। लेकिन इस उत्साह के बीच कुछ ऐसे आंकड़े भी सामने आते हैं, जो नीति-निर्माताओं और समाज—दोनों के लिए चिंता का विषय हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों की हिस्सेदारी महज 2 से 5 प्रतिशत के बीच है।
यह तथ्य उस समय और गंभीर हो जाता है, जब दुनिया के विकसित देशों से तुलना की जाए। दक्षिण कोरिया में यह आंकड़ा लगभग 96 प्रतिशत, जर्मनी में 75 प्रतिशत, जापान में 80 प्रतिशत और ब्रिटेन में 68 प्रतिशत तक है। साफ है कि भारत की युवा शक्ति अभी भी कौशल के स्तर पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा से काफी पीछे है।
योजनाएं बहुत, परिणाम सीमित
2014 के बाद मोदी सरकार ने कौशल विकास को प्राथमिकता देते हुए अलग से कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय का गठन किया। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) को ‘अंब्रेला स्कीम’ के रूप में लागू किया गया, जिसके अब तक चार चरण पूरे हो चुके हैं। बार-बार संशोधन इस बात के संकेत हैं कि अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं।
वर्तमान चरण में उद्योगों की जरूरत के अनुसार आईटीआई और अन्य प्रशिक्षण संस्थानों में नए पाठ्यक्रम शुरू करने, उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने और प्रशिक्षण को अधिक व्यावहारिक बनाने पर जोर दिया जा रहा है। फिर भी मंत्रालय खुद यह स्वीकार करता रहा है कि उद्योग जगत अभी अपेक्षित गंभीरता से इस अभियान में भागीदार नहीं बन पाया है। बदलती तकनीक के साथ स्किल गैप लगातार बढ़ता जा रहा है।
शिक्षा से कौशल तक की टूटी कड़ी
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उद्देश्य शिक्षा और कौशल को एक ही ट्रैक पर लाना था, ताकि शिक्षा किताबी न रहकर रोजगारोन्मुख बने। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि समस्या जड़ में है। सरकारी डेटा के अनुसार, दसवीं तक सकल नामांकन अनुपात 78 प्रतिशत है, बारहवीं तक 58 प्रतिशत और स्नातक स्तर पर यह घटकर सिर्फ 29 प्रतिशत रह जाता है। यानी बड़ी संख्या में युवा स्कूल के बाद ही सिस्टम से बाहर हो जाते हैं—बिना किसी ठोस कौशल के।
अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के वाइस चेयरमैन एमपी पूनिया का कहना है कि स्कूली स्तर पर व्यावसायिक प्रशिक्षण की कमी सबसे बड़ी बाधा है। जब छात्र उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाते, तो उनके पास उद्योगों के लिए आवश्यक हुनर नहीं होता और उद्योग उन्हें स्वीकार नहीं करते। उनका सुझाव है कि सिंगापुर और ब्रिटेन की तरह भारत में भी नौवीं कक्षा से ही कौशल प्रशिक्षण शुरू होना चाहिए और स्नातक स्तर पर कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सेदारी कौशल आधारित शिक्षा की होनी चाहिए।
भारत के पास युवा जनसंख्या का जो जनसांख्यिकीय लाभ (डेमोग्राफिक डिविडेंड) है, वह तभी वरदान बनेगा जब उसे कौशल में बदला जाए। योजनाओं की कमी नहीं है, लेकिन क्रियान्वयन, उद्योग-शिक्षा साझेदारी और जमीनी स्तर पर निगरानी की कमी साफ दिखती है। सवाल बजट बढ़ाने का नहीं, बल्कि मौजूदा संसाधनों के प्रभावी उपयोग और शिक्षा व्यवस्था में समयबद्ध सुधार का है।
अगर स्कूली शिक्षा से ही कौशल को जोड़ दिया जाए और उद्योगों को जिम्मेदारी के साथ इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए, तो भारत न सिर्फ अपने युवाओं को रोजगार दे पाएगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को कुशल मानव संसाधन भी उपलब्ध करा सकेगा। अन्यथा ‘स्किल कैपिटल’ का सपना आंकड़ों और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा।