नेम प्लेट हटाकर पुलिसकर्मी कर सकते हैं ड्यूटी? जानिए सुप्रीम कोर्ट के नियम और कानून
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों के बिना नेम प्लेट ड्यूटी करते नजर आने के बाद इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जवानों को सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, धमकियों और व्यक्तिगत सुरक्षा के खतरे से बचाने के लिए कई बार नेम प्लेट हटाई जाती है। वहीं, कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि पुलिस की पहचान छिपने से जवाबदेही प्रभावित हो सकती है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई वर्दीधारी पुलिसकर्मी कानूनी तौर पर बिना नेम प्लेट या स्पष्ट पहचान के ड्यूटी कर सकता है?
वर्दी का जरूरी हिस्सा है नेम प्लेट
पुलिस के यूनिफॉर्म नियमों और विभागीय निर्देशों में वर्दी पर नेम प्लेट और बैज नंबर लगाए जाने का प्रावधान है। इसका मकसद यह है कि आम नागरिक ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मी की पहचान आसानी से कर सके।
किसी पुलिसकर्मी की कार्रवाई पर सवाल उठने की स्थिति में उसकी पहचान बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। नाम और बैच नंबर के जरिए ही शिकायत, जांच या किसी कानूनी कार्रवाई में संबंधित अधिकारी तक पहुंचना संभव होता है।
डीके बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
पुलिस की पहचान और जवाबदेही को लेकर सुप्रीम कोर्ट का डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य का फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। 1997 के इस फैसले में गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े मामलों में पुलिसकर्मियों की स्पष्ट पहचान सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया था।
अदालत ने माना था कि गिरफ्तारी या हिरासत की कार्रवाई में शामिल पुलिसकर्मियों की पहचान स्पष्ट होना जरूरी है। इसका उद्देश्य पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता बढ़ाना और हिरासत में होने वाले अधिकारों के उल्लंघन पर जवाबदेही तय करना था।
BNSS की धारा 36 में क्या प्रावधान है?
नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 36 में गिरफ्तारी से जुड़ी प्रक्रिया के दौरान पुलिस अधिकारी की पहचान को लेकर प्रावधान किया गया है। गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी की पहचान स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि संबंधित व्यक्ति और उसके परिजन यह जान सकें कि कार्रवाई किस अधिकारी ने की है। इसका सीधा संबंध पुलिस की जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों से है।
प्रदर्शन के दौरान नेम प्लेट हटाने की पुलिस की दलील
प्रदर्शन और आंदोलनों के दौरान पुलिसकर्मियों की पहचान सार्वजनिक होने से जुड़ी सुरक्षा चिंताएं भी सामने आती रही हैं। अधिकारियों का तर्क है कि प्रदर्शन के दौरान जवानों के नाम और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उन्हें ट्रोलिंग, ऑनलाइन धमकियों और साइबर उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है। कई मामलों में उनके परिवारों को भी निशाना बनाए जाने की आशंका रहती है।
इसी वजह से संवेदनशील ड्यूटी के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों द्वारा अस्थायी रूप से नेम प्लेट हटाने की बात सामने आती है। हालांकि, सवाल यह है कि सुरक्षा संबंधी चिंता और पुलिस की सार्वजनिक जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
सादे कपड़ों में कार्रवाई पर भी उठते हैं सवाल
विवाद तब और गंभीर हो जाता है, जब प्रदर्शन या भीड़ नियंत्रण के दौरान कुछ पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में नजर आते हैं। खुफिया जानकारी जुटाने या विशेष अभियानों में पुलिस का सिविल ड्रेस में होना सामान्य प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग या लाठीचार्ज में ऐसी स्थिति सवाल खड़े कर सकती है।
आम नागरिक के लिए यह पहचानना मुश्किल हो सकता है कि सादे कपड़ों में मौजूद व्यक्ति पुलिसकर्मी है या कोई अन्य व्यक्ति। ऐसे मामलों में पुलिस नेतृत्व की ओर से स्पष्टता और कार्रवाई में शामिल जवानों की पहचान सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
बल प्रयोग के दौरान पहचान क्यों जरूरी?
प्रदर्शन के दौरान पुलिस बल का इस्तेमाल होने पर पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर किसी प्रदर्शनकारी को चोट लगती है या उसके अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगता है, तो जांच के लिए यह पता होना जरूरी है कि कार्रवाई में कौन-कौन से पुलिसकर्मी शामिल थे।
नेम प्लेट और बैज नंबर सिर्फ पुलिसकर्मी की पहचान बताने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि ये पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वहीं, पुलिसकर्मियों की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। इसलिए जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें जवानों की व्यक्तिगत सुरक्षा से समझौता किए बिना उनकी आधिकारिक पहचान और जवाबदेही भी बनी रहे।