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चौरासी कुटिया: महर्षि महेश योगी की विरासत
 

 

​लेखक - हरीश भट्ट ऋषिकेश, देहरादून

ऋषिकेश, जिसे दुनिया 'योग की राजधानी' के रूप में जानती है, अपने भीतर अनगिनत आध्यात्मिक रहस्यों को समेटे हुए है। गंगा के कल-कल बहते स्वर और हिमालय की तलहटी में बसा यह शहर सदियों से साधकों को अपनी ओर खींचता रहा है। यहीं राजाजी टाइगर रिजर्व की घनी हरियाली के बीच एक ऐसी जगह है, जो न केवल आध्यात्मिकता बल्कि वैश्विक संगीत के इतिहास का भी एक अटूट हिस्सा है। इसे दुनिया 'चौरासी कुटिया' या 'बीटल्स आश्रम' के नाम से जानती है। ​यह मात्र एक ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि एक अद्भुत और अकल्पनीय संसार है। यहां कदम रखते ही समय का पहिया जैसे उलटा घूम जाता है और अहसास होने लगता है कि पुराने समय में ऋषि-मुनि कैसे योग और ध्यान के जरिए ब्रह्मांड की ऊर्जा से जुड़ा करते थे।

महर्षि महेश योगी की विरासत और स्थापना का इतिहास

चौरासी कुटिया की कहानी अप्रैल 1961 से शुरू होती है। भावातीत ध्यान (Transcendental Meditation) के प्रणेता महर्षि महेश योगी एक ऐसी जगह की तलाश में थे, जहाँ दुनिया भर से लोग आकर मौन साधना कर सकें। उन्होंने वन विभाग से करीब 15 एकड़ जमीन 20 साल की लीज पर ली और 'शंकराचार्य नगर' की नींव रखी। ​महर्षि का दृष्टिकोण बहुत स्पष्ट था। वे प्राचीन भारतीय योग विज्ञान को आधुनिक सुख-सुविधाओं के साथ जोड़ना चाहते थे। इसी सोच के साथ उन्होंने यहाँ अद्भुत वास्तुशैली वाली 84 छोटी कुटियों और 100 से अधिक गुफाओं का निर्माण करवाया।

बेजोड़ वास्तुकला: योग की 84 मुद्राओं का जीवंत स्वरूप

चौरासी कुटिया का नाम इसके भीतर बने 84 छोटे कमरों के कारण पड़ा। वास्तु विज्ञान के अनुसार, ये कमरे योग की 84 मुद्राओं (Asanas) को समर्पित हैं। प्रत्येक कुटिया का निर्माण इस तरह किया गया था कि वह बाहर से देखने में साधारण लगे, लेकिन भीतर से वह एकांत साधना के लिए पूरी तरह उपयुक्त हो। ये कमरे आकार में भले ही छोटे हों, लेकिन इनमें रोशनी और हवा का प्रबंधन इस तरह किया गया है कि घंटों बैठने के बाद भी साधक को ताजगी का अहसास हो। यह उस दौर की वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ सादगी और विज्ञान का अनूठा मेल देखने को मिलता है।​

पत्थरों का रहस्य: अंडाकार ध्यान गुफाएं

​आश्रम परिसर में थोड़ा ऊपर की ओर बढ़ने पर पर्यटकों का सामना कुछ विचित्र अंडाकार आकृतियों (Oval Structures) से होता है। ये दरअसल ध्यान लगाने के लिए बनाई गई गुफाएं हैं।

  • ​प्राकृतिक सामग्री: इन्हें स्थानीय गंगा नदी के गोल पत्थरों से बनाया गया है।
  • ​दो मंजिला ढांचा: ये गुफाएं दो मंजिला हैं, जिनमें ऊपर जाने के लिए छोटी सीढ़ियां बनी हैं।
  • ​सुविधाएं: उस समय इन गुफाओं में बिजली, पानी और शौचालय जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थीं, जो यह दिखाती हैं कि महर्षि महेश योगी अपने समय से कितने आगे की सोच रखते थे।

​आज भी इन गुफाओं के बाहर लिखे नंबरों को देखकर उस दौर की व्यवस्थित साधना पद्धति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

गुरु भक्ति और 125 गुंबद वाले कॉटेज

इस स्थान के साथ एक गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव भी है। महर्षि महेश योगी के गुरु, स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती, 84 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हुए थे। उन्हीं की पावन स्मृति में महर्षि ने इन 84 कुटियों का निर्माण कराया। ​1971 में महर्षि के भतीजे डॉ. आनंद श्रीवास्तव यहां आए और गुरु की आज्ञा पर 1975 में यहां 125 गोल पत्थर के गुंबद वाले कॉटेज बनाए गए। दिलचस्प बात यह है कि उस दौर में एक कॉटेज को बनाने की लागत मात्र 8,000 रुपये आई थी। इन कॉटेज में शयनकक्ष, ध्यान स्थल और आधुनिक सुविधाएं थीं, जो उस समय विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र बनीं।​

जब 'बीटल्स' की धुन ने ऋषिकेश को दुनिया के नक्शे पर चमकाया

​चौरासी कुटिया को वैश्विक ख्याति तब मिली जब 1968 में ब्रिटेन का मशहूर म्यूजिकल ग्रुप 'The Beatles' यहाँ पहुँचा। जॉन लेनन, पॉल मेकार्टनी, जॉर्ज हैरिसन और रिंगो स्टार—ये चारों संगीतकार मानसिक शांति की तलाश में महर्षि के पास आए थे। आश्रम के शांत वातावरण और आध्यात्मिक ऊर्जा ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने यहाँ अपने प्रवास के दौरान करीब 48 गाने कंपोज़ किए। इनमें से अधिकांश गाने उनके मशहूर 'White Album' का हिस्सा बने।

​प्रसिद्ध रचनाएं: 'Back in the U.S.S.R', 'Dear Prudence', और 'Mother Nature’s Son' जैसे गानों की धुनें इसी आश्रम की हवाओं में रची-बसी हैं।
​सितार से प्रेम: इसी प्रवास के दौरान जॉर्ज हैरिसन ने पंडित रवि शंकर जी से सितार सीखना शुरू किया, जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिम में एक नई पहचान दिलाई।
समय का थपेड़ा और 2015 में पुनर्जन्म​

80 के दशक के आते-आते लीज समाप्त होने और अन्य कारणों से यह आश्रम धीरे-धीरे उपेक्षित हो गया। कई दशकों तक यह परिसर वीरान रहा और खंडहर में तब्दील होने लगा। लेकिन बीटल्स के प्रशंसकों और योग प्रेमियों का यहाँ आना कभी बंद नहीं हुआ। ​अंततः, 2015 में उत्तराखंड वन विभाग ने इसकी ऐतिहासिक महत्ता को समझते हुए इसे फिर से पर्यटकों के लिए खोल दिया। आज इसे 'बीटल्स आश्रम' के नाम से भी जाना जाता है और यहाँ की दीवारों पर बनी 'बीटल्स' और महर्षि की ग्रैफिटी (Graffiti) युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय है।

ऋषिकेश: योग की अंतरराष्ट्रीय राजधानी का सफर

चौरासी कुटिया ने ऋषिकेश को 'इंटरनेशनल योग कैपिटल' बनाने में नींव के पत्थर का काम किया। बीटल्स के आने के बाद पश्चिमी देशों में योग के प्रति एक नई लहर दौड़ गई। 1980 के दशक में उत्तर प्रदेश सरकार (तत्कालीन) ने मार्च के पहले सप्ताह में 'इंटरनेशनल योग वीक' की शुरुआत की, जो आज एक विशाल अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव का रूप ले चुका है। आज गंगा के दोनों तटों पर चलने वाले सैकड़ों योग और वैलनेस सेंटर कहीं न कहीं उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसे महर्षि महेश योगी ने चौरासी कुटिया के रूप में शुरू किया था।​

भविष्य की योजनाएं: एक नए रूप में वापसी

राजाजी टाइगर रिजर्व के अधिकारियों के अनुसार, अब चौरासी कुटिया के कायाकल्प की तैयारी चल रही है। उत्तराखंड पर्यटन विभाग ने इसके जीर्णोद्धार (Renovation) के लिए सर्वे पूरा कर लिया है। ​चौरासी कुटिया केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, यह उस दौर का गवाह है जब संगीत, आध्यात्मिकता और योग ने मिलकर सीमाओं को मिटा दिया था। चाहे आप संगीत प्रेमी हों, इतिहास में रुचि रखते हों या फिर सिर्फ शांति की तलाश में हों, चौरासी कुटिया की गलियों में घूमना आपके लिए एक 'अतींद्रिय अनुभव' (Transcendental Experience) साबित होगा।

​यह स्थान हमें याद दिलाता है कि भले ही समय बदल जाए, लेकिन शांति और साधना की तलाश कभी खत्म नहीं होती।