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मोह-माया और दुनियादारी: अज्ञात परलोक से बेहतर है ज्ञात वर्तमान

 

मानव सभ्यता का इतिहास केवल युद्धों और आविष्कारों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच निरंतर चलने वाले संघर्ष की कहानी भी है। एक ओर वह मार्ग है जो हमें किसी अदृश्य परलोक, स्वर्ग-नरक, या पुनर्जन्म के चक्र के भय और प्रलोभन में बांधता है। दूसरी ओर वह मार्ग है जो नितांत व्यावहारिक, तार्किक और प्रत्यक्ष है—जो यह मानता है कि "जो सामने है, वही सत्य है।"

जब हम जीवन की गहराइयों में उतरते हैं, तो पाते हैं कि दुनियादारी, रिश्तों का ताना-बाना और यह तथाकथित 'मोह-माया' ही वह एकमात्र वास्तविकता है जिसे हम वास्तव में अनुभव करते हैं।

जन्म और मृत्यु: दो अनजान छोर और बीच का यथार्थ

जीवन एक ऐसी रहस्यमयी पुस्तक के समान है जिसका पहला और अंतिम पृष्ठ फटा हुआ है। हम इस शरीर में आने से पहले कहाँ थे, हमारी चेतना का स्रोत क्या था—इस पर हज़ारों वर्षों से शोध और कल्पनाएँ जारी हैं, लेकिन कोई भी ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

ठीक इसी तरह, मृत्यु के बाद क्या होता है, क्या कोई आत्मा बचती है या हम शून्य में विलीन हो जाते हैं—इस पर भी मौन ही अंतिम उत्तर है।

जब इन दो छोरों के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध ही नहीं है, तो एक अज्ञात भविष्य के काल्पनिक डर या लालच में अपने वर्तमान जीवन के निर्णयों को प्रभावित करना कहाँ की समझदारी है?

अक्सर आध्यात्मिक उपदेशों में वैराग्य पैदा करने के लिए कहा जाता है कि "खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाओगे।" यह सत्य हो सकता है, लेकिन इस आने और जाने के बीच जो 'मजबूत हाथ' हम एक-दूसरे का थामते हैं, वही जीवन की वास्तविक सार्थकता है।

अज्ञात परलोक के डर से वर्तमान के ज्ञात सुखों और कर्तव्यों की बलि देना तर्कसंगत नहीं है।

दुनियादारी: पलायन नहीं, जुड़ाव का महोत्सव

समाज में 'दुनियादारी' शब्द को अक्सर नकारात्मक संदर्भों में देखा जाता है। इसे एक बोझ या बंधन माना जाता है जो हमें 'मुक्ति' से रोकता है। लेकिन वास्तव में, दुनियादारी ही वह मंच है जहाँ हम अपनी मानवीय भूमिकाओं का निर्वहन करते हैं।

समाज, परिवार, करियर और जिम्मेदारियाँ ही वे तत्व हैं जो हमें एक 'इंसान' होने का बोध कराते हैं।

यदि हम स्वयं को दुनियादारी से पूरी तरह काट लें, तो हमारे अस्तित्व का कोई सामाजिक या मानवीय मूल्य शेष नहीं रह जाएगा।

एक पिता का अपने बच्चों के लिए दिन-रात पसीना बहाना, एक मित्र का कठिन समय में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहना, या एक पेशेवर का अपने कौशल से समाज में योगदान देना—ये सब दुनियादारी के ही उत्कृष्ट रूप हैं।

यही वह 'माया' है जो जीवन के पहिए को गति देती है। बिना इस जुड़ाव के, जीवन एक अर्थहीन शून्य बन जाएगा, जहाँ न कोई उद्देश्य होगा और न ही कोई उपलब्धि।

मोह का सकारात्मक पक्ष: प्रेम और सृजन की ऊर्जा

आध्यात्मिक जगत में 'मोह' को बंधनों का मुख्य कारण मानकर त्यागने की सलाह दी जाती है। लेकिन यदि हम मानवीय दृष्टिकोण से देखें, तो मोह ही प्रेम का मूल आधार है।

अपने घर से मोह, अपनी संस्कृति से लगाव और अपने प्रियजनों के प्रति अनुराग ही वह ऊर्जा है जो हमें हर सुबह नई उम्मीद के साथ उठने और कुछ बेहतर करने की प्रेरणा देती है।

सृजन की प्रेरणा: एक चित्रकार अपनी कला से मोह करता है, एक लेखक अपने शब्दों से जुड़ा होता है; इसी मोह के कारण वह कालजयी कृतियों का सृजन कर पाता है।

सुरक्षा और देखभाल: परिवार के प्रति मोह ही हमें एक-दूसरे की रक्षा करने, बीमारों की सेवा करने और बच्चों को सुरक्षित भविष्य देने के लिए प्रेरित करता है।

जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि "जो कुछ है, यहीं है," तो हम उन चीजों और लोगों की अधिक कद्र करने लगते हैं जो वर्तमान में हमारे पास हैं।

वर्तमानवाद (Presentism): एकमात्र उपलब्ध सत्य

हम जिस हवा में अभी सांस ले रहे हैं, जो भोजन चख रहे हैं और जो धूप हम अपनी त्वचा पर महसूस कर रहे हैं, वही हमारे होने का एकमात्र निश्चित प्रमाण है।

परलोक की चिंता करना वैसा ही है जैसे किसी ऐसी फिल्म का टिकट खरीदना जिसके सिनेमाघर का पता ही न हो और जिसके चलने की कोई गारंटी भी न हो।

वर्तमान में जीने का अर्थ यह कतई नहीं है कि हम लापरवाह या गैर-जिम्मेदार हो जाएँ। इसका वास्तविक अर्थ यह है कि हम अपनी पूरी ऊर्जा उन कार्यों और संबंधों पर लगाएं जिन्हें हम देख सकते हैं, छू सकते हैं और बदल सकते हैं।

कर्म का व्यावहारिक और सामाजिक सिद्धांत

परंपरागत रूप से लोग 'अगले जन्म' के भय से या परलोक में सुख पाने के लिए पुण्य करते हैं। लेकिन क्या यह अधिक श्रेष्ठ नहीं होगा कि हम 'इसी जन्म' की शांति और सामाजिक व्यवस्था के लिए नैतिक बनें?

यदि हम समाज में ईमानदारी, करुणा और प्रेम से रहते हैं, तो उसका प्रतिफल हमें इसी जीवन में सम्मान, संतोष और मानसिक शांति के रूप में मिल जाता है।

विरक्ति बनाम पूर्णता

कई विचारधाराएँ सिखाती हैं कि संसार से विरक्त हो जाओ क्योंकि यहाँ सब कुछ नश्वर है। लेकिन क्या कोई वस्तु सिर्फ इसलिए मूल्यहीन हो जाती है क्योंकि वह स्थायी नहीं है?

एक फूल की सुंदरता उसकी क्षणभंगुरता में ही छिपी है—वह सुंदर है क्योंकि वह मुरझा जाएगा। हमारा जीवन भी इसलिए कीमती है क्योंकि यह सीमित है।

यथार्थ का आलिंगन: एक नया दृष्टिकोण

अक्सर कहा जाता है कि दुनिया एक मायाजाल है, लेकिन यह जाल ही हमें एक-दूसरे से जोड़ता है।

यदि एक माँ को अपने बच्चे से 'मोह' न हो, तो वह रात भर जागकर उसकी सेवा क्यों करेगी?

यदि एक इंसान को अपनी प्रतिष्ठा और कर्म से 'मोह' न हो, तो वह श्रेष्ठता के शिखर तक पहुँचने का प्रयास क्यों करेगा?

वर्तमान ही हमारा परम धर्म

अंततः, यह जीवन एक विशाल रंगमंच है जहाँ हमें अपनी भूमिका पूरी शिद्दत, ईमानदारी और जुनून के साथ निभानी है।

मोह, माया और दुनियादारी इस रंगमंच की अनिवार्य सजावट और पटकथा हैं। इनसे भागना स्वयं के अस्तित्व से भागना है।

चूँकि हमारे पास न तो अतीत का कोई भौतिक प्रमाण है और न ही भविष्य का कोई सुनिश्चित नक्शा, इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि हम "आज" और "अभी" के मालिक बनें।

सब कुछ यहीं समाहित है—हमारे प्रेम में, हमारे संघर्षों में, हमारी सफलताओं में और यहाँ तक कि हमारी असफलताओं के अनुभवों में भी।

जो हमें प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है, उसे पूरी तरह जी लेना ही सबसे बड़ी साधना है।

मृत्यु के बाद जो होगा, उसे मृत्यु ही देखेगी; लेकिन फिलहाल जो जीवन हमारे भीतर स्पंदित हो रहा है, उसे संवारना, उसे सुंदर बनाना और उसे भरपूर जीना ही हमारा वास्तविक और एकमात्र धर्म होना चाहिए।

हरीश भट्ट - हिंदी समाचार पत्रों में लेआउट आर्टिस्ट एवं दैनिक जागरण ई-नेक्स्ट के सीनियर डिजाइनर, ऋषिकेश, देहरादून