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धृतराष्ट्र–संजय संवाद व्यंग्य (चमकता शहर, अँधी व्यवस्था)

 

धृतराष्ट्र: संजय! कहो संजय! वह शहर कैसा दिख रहा है—जिसे लोग स्मार्ट, वर्ल्ड-क्लास और ग्लोबल कहते नहीं थकते?
संजय: महाराज! आँखें होतीं तो शायद आप भी चकाचौंध में अंधे हो जाते। गगनचुंबी इमारतें शीशे की तरह चमक रही हैं, सड़कों पर एलईडी रोशनी है, हर खंभे पर चमचमाता बोर्ड टंगा है। पर उसी सड़क के बीच एक गड्ढा है—इतना गहरा कि उसमें एक लड़के की ज़िंदगी गिरकर खत्म हो गई।
धृतराष्ट्र: अरे! वह गड्ढा दिखा क्यों नहीं किसी को?
संजय: महाराज! वह गड्ढा सिस्टम की आँखों से ढका हुआ था। उस पर बजट की फाइलें रखी थीं, टेंडर की मोहरें जमी थीं, और ऊपर से मेंटेनेन्स इन प्रोग्रेस का बोर्ड टँगा था।
धृतराष्ट्र: और लोग? पुलिस? प्रशासन?
संजय: सब उपस्थित थे महाराज—जैसे कुरुक्षेत्र में थे। कोई वीडियो बना रहा था, कोई ट्वीट का ड्राफ्ट लिख रहा था, कोई कह रहा था—“जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।”
धृतराष्ट्र: तो संजय, फिर वह कौन था जो रस्सी पकड़कर गड्ढे में कूद गया?
संजय: वह कोई अधिकारी नहीं था महाराज, कोई मंत्री नहीं। वह एक डिलीवरी बॉय था—पीठ पर बैग, हाथ में रस्सी और मन में मनुष्यता। उसे न प्रोटोकॉल का डर था, न प्रेस कांफ्रेंस की फिक्र।
धृतराष्ट्र: और रणबांकुरे?
संजय: वे बाहर खड़े थे महाराज—हेलमेट पहने, डंडा टिकाए। वे कह रहे थे—“ऊपर से आदेश नहीं है।” जैसे युद्ध में खड़े होकर कहते हों—“आज धर्म अवकाश पर है।”
धृतराष्ट्र: तो क्या यह हिंसा है, संजय?
संजय: हिंसा सिर्फ लाठी से नहीं होती महाराज। कभी-कभी देखते रहना भी हिंसा होता है। मजबूरों के खिलाफ यह सबसे सुरक्षित हिंसा है—जिसमें हाथ भी साफ रहते हैं और कुर्सी भी।
धृतराष्ट्र: क्या हम सच के युग में हैं या भ्रम के?
संजय: हम पोस्ट-ट्रुथ के युग में हैं महाराज। यहाँ सच वही है जो ट्रेंड करे, न्याय वही है जो कैमरे में फिट बैठे। एक मौत दुर्घटना कहलाती है, और एक अदद वीडियो कंटेंट।
धृतराष्ट्र: तो फिर भविष्य क्या कहेगा इस शहर के बारे में?
संजय: भविष्य कहेगा महाराज—“यह वह शहर था जहाँ इमारतें ऊँची थीं,पर संवेदनाएँ गड्ढों में गिर चुकी थीं।”
और इतिहास लिखेगा—“यह युद्ध लड़ा नहीं गया,क्योंकि देखने वाले बहुत थे और लड़ने वाला सिर्फ एक डिलीवरी बॉय।”
धृतराष्ट्र (मौन में):…तो मेरी अंधता ही ठीक थी, संजय।देखकर भी जो न देख पाएँ,वे सब मुझसे अधिक अंधे हैं।