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शाश्वत सत्य

 

जीवन की पगडंडी पर
निरंतर चलते रहना है।
दुख के कांटे भी आएँ तो
कभी न रुकना, न घबराना है।

रात भले ही कितनी लंबी हो,
सुबह का होना तय है।
चाँद भी फीका पड़ जाता है,
जब सूरज का उदय तय है।

कर्मों का पथ साथ लिए चलें,
आशा की नई ज्योति जलाएँ।
कितना भी घना अँधेरा हो,
क्षण में उजियारा फैलाएँ।

साँसों की खिड़की से झाँककर
जीवन के मधुर गीत सुनाएँ।
मन पर बोझ यदि कष्टों का हो,
तो हम कभी न मुस्कुराएँ।

कभी हँसाती, कभी रुलाती,
यह जीवन की लीला निराली है।
ना कुछ मेरा, ना कुछ तेरा,
सब ईश्वर की रखवाली है।

हम सब कठपुतली हैं उसकी,
डोर उसी के हाथ में है।
भाव-भंगिमाएँ दिखाकर वह,
जीवन के हर साथ में है।

ईश्वर ही है शाश्वत सत्य,
इस जग के इस मेले में।
धर्म-पथ पर चलते जाओ,
क्यों पड़ते हो झमेले में।

          — इंदिरा "प्रबुद्ध" शर्मा
               जयपुर (राजस्थान)