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History Of Sugar : कभी ‘मीठा मसाला’ थी चीनी, जानिए कैसे भारत से पूरी दुनिया तक पहुंची इसकी मिठास

 

चाय हो, मिठाई हो या कोई त्योहार हो चीनी के बिना मिठास की कल्पना करना मुश्किल है। भारत समेत पूरी दुनिया में चीनी रोजमर्रा की जिंदगी का एक अहम हिस्सा है। हाल ही में चीनी के दाम तेजी से बढ़ रहे है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जो चीनी हमारे मुंह में मिठास घोलती है कभी वह दुनिया के लिए किसी महंगे मसाले से कम नहीं थी? चीनी का इतिहास हजारों साल पुराना और दिलचस्प है। आइए आपको बताते है कि चीनी दुनिया में कब और कैसे आई?

कभी ‘मीठा मसाला’ कहलाती थी चीनी

शुगर हिस्ट्री के अनुसार, प्राचीन दौर में चीनी एशिया और मध्य पूर्व की बेहद खास और महंगी वस्तुओं में शामिल थी। इसे कई जगह मीठा मसाला’ कहा जाता था। उस दौर में भारत अपने मसालों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता था। ऐसे में जब भारत से चीनी दूसरे देशों तक पहुंची तो इसे भी एक तरह के विशेष मसाले के रूप में देखा गया। यूरोप में तो एक समय इसे ‘शुगर साल्ट यानी मीठा नमक तक कहा गया।

आज जिस चीनी का इस्तेमाल घर-घर में होता है, वह कभी इतनी महंगी और दुर्लभ थी कि इसका उपयोग खास लोगों और विशेष अवसरों तक सीमित रहता था।

न्यू गिनी में हजारों साल पहले हुई गन्ने की खेती

चीनी की कहानी असल में गन्ने से शुरू होती है। इतिहास से जुड़े स्रोतों के मुताबिक, करीब 10 हजार साल पहले न्यू गिनी में गन्ने की खेती शुरू होने के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन गन्ने के रस से क्रिस्टल के रूप में चीनी तैयार करने की तकनीक विकसित करने में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। यही वजह है कि भारत को दुनिया में चीनी की पहचान कराने वाले देशों में प्रमुख माना जाता है।

शुरुआती इंसानी समाज ऐसे पौधों की तलाश में रहते थे जिनमें प्राकृतिक रूप से अधिक मिठास हो। गन्ना इसी खोज का एक महत्वपूर्ण परिणाम बना। धीरे-धीरे गन्ने की जानकारी दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिणी चीन तक पहुंची और फिर यह भारत आया। हालांकि, गन्ने की खेती और उसके इस्तेमाल का इतिहास इससे भी जटिल है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी किस्मों और खेती के तरीके समय के साथ विकसित हुए।

भारत ने गन्ने के रस को चीनी में बदलने की कला विकसित की

भारत में गन्ने की खेती के लिए अनुकूल जलवायु ने इस पौधे को खूब फलने-फूलने का मौका दिया। शुरुआत में लोग गन्ने को सीधे चबाकर उसका मीठा रस निकालते थे।

इसके बाद गन्ने के रस को उबालकर उसे गाढ़ा करने और अलग-अलग रूपों में सुरक्षित रखने की तकनीक विकसित हुई। लगभग 500 ईसा पूर्व के आसपास भारत में गन्ने के रस से चीनी के क्रिस्टल बनाने की तकनीक विकसित होने का उल्लेख मिलता है। यही तकनीक चीनी के इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हुई। अब मीठे रस को लंबे समय तक सुरक्षित रखना और उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान हो गया।

गुप्त काल में भी चीनी का इस्तेमाल

भारत में चीनी के उत्पादन और इस्तेमाल का विकास धीरे-धीरे आगे बढ़ा। लगभग 350 ईस्वी के आसपास चीनी को क्रिस्टल के रूप में तैयार करने की तकनीक के विकास का उल्लेख मिलता है। गुप्त काल तक भारत में चीनी का इस्तेमाल अच्छी तरह स्थापित हो चुका था।

भारत से यह तकनीक और चीनी बनाने का ज्ञान दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचा। व्यापारियों और यात्रियों के माध्यम से चीनी की जानकारी एशिया, मध्य पूर्व और बाद में यूरोप तक पहुंचती गई। इस तरह गन्ना भले ही भारत की खोज न रहा हो, लेकिन गन्ने के रस को संसाधित करके चीनी तैयार करने की कला को विकसित करने में भारत का योगदान ऐतिहासिक रूप से बेहद अहम रहा।

चीनी ने बदली दुनिया की अर्थव्यवस्था

चीनी की कहानी केवल स्वाद तक सीमित नहीं है। समय के साथ यह दुनिया की अर्थव्यवस्था और व्यापार को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण वस्तु बन गई।

यूरोप में चीनी की मांग बढ़ने के साथ बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती शुरू हुई। इसके लिए विशाल कृषि क्षेत्रों और श्रम की जरूरत पड़ी। 17वीं से 19वीं सदी के बीच कैरेबियन और अमेरिका में गन्ने के बागानों के विस्तार ने अटलांटिक दास व्यापार को भी बढ़ावा दिया। यानी एक छोटी-सी दिखने वाली चीज—चीनीने दुनिया के व्यापार, उपनिवेशवाद, कृषि और सामाजिक व्यवस्था तक को प्रभावित किया।

आज फिर चर्चा में है चीनी

आज चीनी दुनिया की सबसे सामान्य खाद्य वस्तुओं में शामिल है। भारत भी दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में गिना जाता है। हाल ही में भारत सरकार ने 31 अक्टूबर तक 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी है। हजारों साल पहले जिस गन्ने का इस्तेमाल लोग केवल उसके मीठे रस के लिए करते थे, उसी से विकसित हुई चीनी आज वैश्विक खाद्य उद्योग का अहम हिस्सा है।