पेट्रोल में मिलने वाला एथेनॉल आखिर बनता कैसे है? जानिए गन्ने से आगे की पूरी कहानी
एथेनॉल आखिर कैसे बनता है? क्या यह सिर्फ गन्ने से तैयार होता है या खेती के कचरे और शैवाल से भी बनाया जा सकता है? जानिए 1G, 2G, 3G और 4G एथेनॉल उत्पादन की पूरी प्रक्रिया, इनके फायदे, नुकसान और भारत की भविष्य की रणनीति।
Ethanol Production Explained: आज देशभर के पेट्रोल पंपों पर मिलने वाला E20 पेट्रोल चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकार लगातार पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ा रही है ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हो, किसानों को नई आय का स्रोत मिले और प्रदूषण भी घटाया जा सके। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर पेट्रोल में मिलाया जाने वाला एथेनॉल बनता कैसे है? क्या यह सिर्फ गन्ने से तैयार होता है या इसके और भी आधुनिक तरीके हैं?
दरअसल, समय के साथ एथेनॉल बनाने की तकनीक भी विकसित हुई है। आज दुनिया में इसे चार पीढ़ियों—1G, 2G, 3G और 4G एथेनॉल—में बांटा जाता है। हर तकनीक अलग कच्चे माल, अलग प्रक्रिया और अलग उद्देश्य पर आधारित है।
सबसे पहले समझिए एथेनॉल क्या है?
एथेनॉल एक प्रकार का जैव ईंधन (Biofuel) है, जिसे प्राकृतिक और जैविक स्रोतों से तैयार किया जाता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर वाहनों में इस्तेमाल किया जाता है। इससे पेट्रोल की खपत कम होती है, विदेशी तेल पर निर्भरता घटती है और कार्बन उत्सर्जन भी कम करने में मदद मिलती है। इसी वजह से भारत समेत दुनिया के कई देश एथेनॉल मिश्रित ईंधन को बढ़ावा दे रहे हैं।
1G एथेनॉल: गन्ने और अनाज से बनने वाला सबसे पुराना तरीका
एथेनॉल उत्पादन की शुरुआत पहली पीढ़ी यानी फर्स्ट जेनरेशन (1G) तकनीक से हुई थी। इसमें गन्ने का रस, शीरा (मोलासेस), मक्का, गेहूं और अन्य स्टार्च या शर्करा वाले खाद्यान्नों का उपयोग किया जाता है।
इस प्रक्रिया में पहले इन फसलों से शर्करा निकाली जाती है। फिर यीस्ट की मदद से उसका किण्वन (Fermentation) कराया जाता है। इसके बाद आसवन (Distillation) की प्रक्रिया से शुद्ध एथेनॉल तैयार होता है।
यह तकनीक आज भी सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाती है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसमें खाद्यान्नों का उपयोग होता है। इसलिए इसे लेकर अक्सर 'फूड बनाम फ्यूल' की बहस छिड़ जाती है।
2G एथेनॉल: खेतों के कचरे से तैयार होता है ईंधन
पहली तकनीक की सीमाओं को देखते हुए वैज्ञानिकों ने दूसरी पीढ़ी यानी 2G एथेनॉल विकसित किया। इसमें गन्ने की खोई, धान की पराली, गेहूं का भूसा, मक्के के डंठल, लकड़ी के अवशेष और दूसरे कृषि अपशिष्ट का उपयोग किया जाता है। इन अवशेषों में मौजूद सेलुलोज और हेमी-सेलुलोज को विशेष रासायनिक और जैविक प्रक्रिया के जरिए शर्करा में बदला जाता है। इसके बाद वही प्रक्रिया अपनाकर एथेनॉल तैयार किया जाता है।
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें खाद्यान्न की जरूरत नहीं पड़ती और खेतों में बचा कृषि कचरा भी उपयोग में आ जाता है। इससे पराली जलाने जैसी समस्या कम करने में भी मदद मिल सकती है।
3G एथेनॉल: शैवाल से तैयार हो रहा भविष्य का ईंधन
तीसरी पीढ़ी यानी 3G एथेनॉल में कच्चे माल के रूप में शैवाल (Algae) का इस्तेमाल किया जाता है। शैवाल बहुत तेजी से बढ़ते हैं, कम जगह घेरते हैं और इन्हें उगाने के लिए खेती योग्य जमीन की जरूरत भी नहीं होती। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे भविष्य का टिकाऊ ईंधन मानते हैं।
हालांकि, फिलहाल शैवाल से बड़े पैमाने पर एथेनॉल तैयार करना काफी महंगा है। उत्पादन और प्रोसेसिंग की लागत अधिक होने के कारण यह तकनीक अभी शोध और सीमित प्रयोग तक ही सीमित है।
4G एथेनॉल: सबसे आधुनिक तकनीक
एथेनॉल उत्पादन की सबसे नई तकनीक 4G यानी फोर्थ जेनरेशन बायोफ्यूल है। इसमें वैज्ञानिक जेनेटिक इंजीनियरिंग और सिंथेटिक बायोलॉजी की मदद से ऐसे सूक्ष्मजीव विकसित कर रहे हैं, जो अधिक दक्षता से एथेनॉल तैयार कर सकें।
इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि भविष्य में इसे कार्बन कैप्चर तकनीक के साथ जोड़कर वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम करने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि यह तकनीक अभी पूरी तरह व्यावसायिक स्तर पर उपलब्ध नहीं है और इस पर दुनिया के कई देशों में शोध जारी है।
चारों तकनीकों में क्या है सबसे बड़ा अंतर?
चारों पीढ़ियों की सबसे बड़ी पहचान इनके कच्चे माल और उत्पादन प्रक्रिया में है। पहली पीढ़ी में खाद्यान्नों का उपयोग होता है। दूसरी पीढ़ी कृषि अवशेषों का इस्तेमाल करती है। तीसरी पीढ़ी शैवाल पर आधारित है, जबकि चौथी पीढ़ी पूरी तरह आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी और जेनेटिक इंजीनियरिंग पर आधारित मानी जाती है। यानी समय के साथ एथेनॉल उत्पादन का उद्देश्य सिर्फ ईंधन बनाना नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ ऊर्जा स्रोत विकसित करना भी बन गया है।
भारत किस तकनीक पर सबसे ज्यादा काम कर रहा है?
भारत में फिलहाल सबसे अधिक उत्पादन 1G एथेनॉल का होता है, जिसमें गन्ने के शीरे और अनाज का उपयोग किया जाता है। इसके साथ ही सरकार 2G एथेनॉल संयंत्रों पर भी तेजी से निवेश कर रही है ताकि पराली और कृषि अपशिष्ट से ईंधन तैयार किया जा सके। इससे किसानों को अतिरिक्त आय मिलेगी और पर्यावरण को भी फायदा होगा।
क्या भविष्य में पेट्रोल की जगह एथेनॉल ले लेगा?
आने वाले वर्षों में एथेनॉल की हिस्सेदारी लगातार बढ़ेगी, लेकिन फिलहाल यह पूरी तरह पेट्रोल की जगह नहीं ले सकता। हालांकि 3G और 4G जैसी नई तकनीकों के सफल होने के बाद बायोफ्यूल उद्योग में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अगर उत्पादन लागत कम होती है और तकनीक व्यावसायिक स्तर पर सफल होती है, तो भविष्य में एथेनॉल ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर बदल सकता है।