कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया... कभी कजरी की तान पर बरस उठते थे मेघ, अब आधुनिकता की दौड़ में खो रही पूर्वांचल की लोक विरासत
कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...वो सावन की पहली फुहार, पेड़ों की डालियों पर पड़े झूले और उनकी पींगों के साथ गूंजती कजरी गीतों की ये मीठी पक्तियां...कभी पूर्वांचल के गांवों में सावन का यही सबसे खूबसूरत रंग हुआ करती थी। मायके लौटीं बेटियां सहेलियों के साथ झूला झूलतीं और कजरी के गीतों में अपने मन की बात कहतीं। कहीं पिया के विरह की टीस होती, तो कहीं प्रेम और श्रृंगार का रस। कजरी की धुनों में सावन जैसे खुद उतर आता था, लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध और आज सोशल मीडिया के दौर में कजरी की मिठास खोती जा रही है।
समय बदला, लोगों की जीवनशैली बदली और मनोरंजन के साधन भी बदल गए। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के दौर में झूले पर बैठकर सामूहिक रूप से कजरी गाने की परंपरा अब पहले जैसी दिखाई नहीं देती। पश्चिमी संस्कृति और आधुनिक मनोरंजन की बढ़ती लोकप्रियता के बीच पूर्वांचल की यह अनमोल लोक विरासत धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है।
कभी गीत छिड़ते ही बरस उठते थे मेघ
कहते हैं, कजरी सिर्फ एक लोकगीत नहीं, बल्कि पूर्वांचल की मिट्टी, मौसम, प्रेम और विरह की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसकी धुन में ऐसी मिठास थी कि मानो गीत छिड़ते ही आसमान में बादल ठहर जाते और कजरारे नैनों की विरह-वेदना बारिश की बूंदों में बदल जाती।
मिर्जापुरी और बनारसी कजरी की अलग पहचान
कजरी मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाकों में गाई जाने वाली लोकगायन परंपरा है। पूर्वांचल में इसकी दो प्रमुख शैलियां विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, मिर्जापुरी कजरी और बनारसी कजरी।
कजरी की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसे लेकर निश्चित तौर पर कुछ कहना मुश्किल है, लेकिन लोक मान्यताओं और परंपराओं को देखें तो यह गीत सदियों से ग्रामीण जीवन का हिस्सा रहा है। जब इंसान ने प्रकृति के साथ अपने सुख-दुख को सुर और शब्द देना शुरू किया, उसी दौर से कजरी जैसी लोक परंपराओं के जन्म की कल्पना की जाती है।
झूले की पींगों के साथ गूंजती थी कजरी
करीब डेढ़ दशक पहले तक सावन के आते ही गांवों में कजरी की रौनक देखते ही बनती थी। रिमझिम फुहारों के बीच रात में महिलाएं पेड़ों पर पड़े झूलों पर बैठतीं और सामूहिक रूप से कजरी गाती थीं। उनकी आवाज में कभी पिया से मिलने की बेचैनी होती, तो कभी मायके की खुशियों का उल्लास। वीराना रहे चाहे जाएं हो सवनवा में ना जाबे न ननदी...और...पिया मेहंदी मंगा द मोती झील से जा के साइकिल से ना...ऐसे लोकगीतों के जरिए महिलाएं अपने मन के भाव सहजता से व्यक्त करती थी। कजरी उनके लिए मनोरंजन का साधन भर नहीं थी, बल्कि यह उनके सुख-दुख, प्रेम, शिकायत और विरह को शब्द देने का माध्यम भी थी।
कजरी में प्रेम भी, विरह भी और शिव-पार्वती का श्रृंगार भी
कजरी की खासियत यही रही कि इसमें जीवन के अलग-अलग रंग समाए हुए हैं। पिया के इंतजार और विरह की पीड़ा से लेकर राधा-कृष्ण के प्रेम और शिव-पार्वती के श्रृंगार तक, लोक गायिकाओं ने हर भाव को अपनी आवाज में पिरोया। हरे रामा, कृष्ण बने मनिहारी, पहन लिए साड़ी रे हरी...जैसे गीतों में राधा-कृष्ण के प्रेम की मिठास सुनाई देती थी। सावन के दौरान झूले पर बैठकर इन गीतों को गाने की परंपरा खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में अधिक प्रचलित रही।
धान के खेतों में भी गूंजती थी कजरी
कजरी का रिश्ता सिर्फ झूले और सावन से नहीं था। धान की रोपाई के दौरान खेतों में काम करती महिलाएं भी कजरी गाती थीं। घंटों तक खेतों में काम करने के बावजूद लोकगीतों की लय उन्हें थकान का एहसास नहीं होने देती थी। एक सुर में उठती महिलाओं की आवाज, बारिश की फुहार और मिट्टी की सौंधी खुशबू... यह दृश्य पूर्वांचल के ग्रामीण जीवन की अपनी अलग पहचान हुआ करता था। कजरी गांव की चौपालों से लेकर बड़े मंचों और दूरदर्शन तक पहुंची।
मिर्जापुर, वाराणसी, जौनपुर और आसपास के इलाकों में कजरी की अपनी समृद्ध परंपरा रही है। सावन और भादों में कजरी के दंगल आयोजित होते थे, जहां लोकगायक और गायिकाएं अपनी कला का प्रदर्शन करते और देर रात तक श्रोता इन गीतों में डूबे रहते।
आज भी सावन आता है, बादल घिरते हैं, बारिश होती है और पेड़ों पर झूले भी पड़ते हैं, लेकिन वह सामूहिक कजरी की आवाज अब पहले जैसी सुनाई नहीं देती। कभी जिस काशी और पूर्वांचल में सावन की पहचान ही कजरी की मधुर तान हुआ करती थी, आज उसी कजरी को सुनने के लिए कान तरस जाते हैं।