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मैं खुद में ही खुद को ढूँढने निकला हूँ....

 

मैं खुद में ही खुद को
ढूँढने निकला हूँ,
न जाने खुद को
किस हद तक जानने निकला हूँ।

मैं चाहता तो उलझ सकता था
शिकवे और शिकायतो में,
खुद को कोसने में,
बीते लम्हों को संजोए रखने में।

पर यह मेरी सोच नहीं
कि ठग सकूँ खुद को खुद से,
आखिर खुदा ने भी तो
बनाया होगा कुछ उसूल से।

अब फर्क नहीं पड़ता
किसी की बातों से,
खुद की उलझनों से
या किसी के तानों से।

मैं खुद में ही खुद को
ढूँढने निकला हूँ,
न जाने खुद को
किस हद तक जानने निकला हूँ।

- नवनीत कुमार (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय छात्र)