{"vars":{"id": "130921:5012"}}

गलत समय पर इजराइल दौरा... ईरान-इजराइल युद्ध में भारत किसके साथ? चुप्पी या रणनीति

ईरान-इजराइल संघर्ष के बीच भारत की संतुलन आधारित पश्चिम एशिया नीति कठिन परीक्षा में है। मोदी सरकार ने संयम की अपील की, पर ईरान और खामेनेई की हत्या पर स्पष्ट टिप्पणी से परहेज किया। विपक्ष इसे झुकाव बता रहा है, जबकि सरकार इसे जिम्मेदार कूटनीति कहती है।

 

Iran Israel Conflict: पश्चिम एशिया में दशकों से भारत की विदेश नीति की पहचान रही है- प्रतिस्पर्धी देशों के साथ समानांतर रिश्ते बनाए रखना और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना। इजराइल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंध इसी रणनीति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमले और ईरान की जवाबी मिसाइल कार्रवाई के बाद यह संतुलन अब अपनी सबसे बड़ी परीक्षा से गुजर रहा है।

दो लॉन्ग टर्म रणनीतिक साझेदार-इजराइल और ईरान,जब सीधे टकराव में हों, तो क्या भारत वास्तव में न्यूटरल रह सकता है?

शुरुआती संकेत: संतुलन या झुकाव?

संघर्ष के बाद भारत ने संयम और तनाव कम करने की अपील तो की, लेकिन अमेरिका-इजराइल हमले की स्पष्ट निंदा नहीं की। न ही ईरान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन पर खुलकर एकजुटता दिखाई। ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की हत्या पर भी नई दिल्ली की चुप्पी ने बहस को और तेज कर दिया।

यह रुख प्रधानमंत्री मोदी की हालिया इजराइल यात्रा के बाद सामने आया, जिससे विपक्ष ने संकेत लिया कि भारत का झुकाव अब स्पष्ट हो चुका है। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि यह “जिम्मेदार कूटनीति” है, न कि पक्षधरता।

‘गलत समय’ पर इजराइल दौरा?

पूर्व राजदूत के.सी. सिंह ने टिप्पणी की कि इजराइल यात्रा का समय गलत था और इससे भारत की पारंपरिक तटस्थता को आघात पहुंचा। उनका मानना है कि वैश्विक धारणा में भारत अब इजराइल खेमे के करीब दिख रहा है।

यह धारणा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में 90 लाख से अधिक भारतीय काम करते हैं और भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर है।

दो फोन कॉल, दो अलग संदेश, UAE के राष्ट्रपति से बातचीत

प्रधानमंत्री ने यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से बात की, जब ईरानी मिसाइलें खाड़ी क्षेत्र में गिर रही थीं। उन्होंने हमलों की “कड़ी निंदा” की और एकजुटता व्यक्त की, हालांकि ईरान का नाम नहीं लिया।

इजराइल के प्रधानमंत्री से संवाद

अगले दिन उन्होंने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू से बातचीत की और शत्रुता शीघ्र समाप्त करने का आग्रह किया।

ध्यान देने वाली बात यह रही कि ईरान से सार्वजनिक स्तर पर कोई संवाद सामने नहीं आया, जबकि भारत ने चाबहार पोर्ट जैसे रणनीतिक निवेश किए हैं, जो पाकिस्तान को बाईपास कर मध्य एशिया तक पहुंच का मार्ग देता है।

बदला हुआ संतुलन?

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत-इजराइल संबंधों को नई गति मिली है। रक्षा और तकनीकी सहयोग में इजराइल शीर्ष साझेदारों में है और भारत इजराइली हथियार निर्यात का बड़ा खरीदार है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भले ही भारत ने सार्वजनिक रूप से किसी पक्ष का समर्थन नहीं किया, लेकिन उसके राष्ट्रीय हित अमेरिका-इजराइल खेमे के साथ अधिक मेल खाते दिख रहे हैं।

विपक्ष का हमला

कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने सरकार की चुप्पी को “त्याग” करार देते हुए कहा कि यह तटस्थता नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी से विमुख होना है। उन्होंने इसे “मूक समर्थन” जैसा संकेत बताया।

अन्य विपक्षी नेताओं ने भी इसे ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंधों के विपरीत बताया।

भाजपा का जवाब

भाजपा नेता अमित मालवीय ने कहा कि जिम्मेदार कूटनीति को चुप्पी समझना गलत है। उनके अनुसार भारत लगातार संयम, संप्रभुता के सम्मान और तनाव कम करने की अपील कर रहा है। विदेश नीति को “चयनात्मक आक्रोश” के आधार पर नहीं चलाया जा सकता।

वैश्विक प्रतिक्रिया भी सीमित

यह भी उल्लेखनीय है कि खामेनेई की हत्या पर मुस्लिम बहुल देशों की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत ठंडी रही। 57 सदस्यीय इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) में से दस से भी कम देशों ने औपचारिक शोक व्यक्त किया।

आगे की राह: जोखिम और अवसर

भारत की मौजूदा रणनीति सावधानीपूर्वक संतुलित दिखती है- सार्वजनिक रूप से शांति की अपील, परंतु ईरान पर स्पष्ट टिप्पणी से परहेज।

सवाल यह है कि क्या यह रणनीतिक दांव दीर्घकाल में भारत के हितों को सुरक्षित रख पाएगा, या फिर संतुलन की दशकों पुरानी नीति में स्थायी बदलाव का संकेत है?

भारत की विदेश नीति फिलहाल एक नाजुक मोड़ पर खड़ी है, जहां हर शब्द और हर चुप्पी, दोनों का अर्थ निकाला जा रहा है।