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जीडीपी में 25% मैन्युफैक्चरिंग का सपना अब भी अधूरा, 2026-27 के बजट से बड़ी उम्मीद

नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन की घोषणा के एक साल बाद भी लॉन्च न होने से उद्योग जगत निराश है। बढ़ते आयात, ऊंची लागत और वैश्विक दबावों के बीच 2026-27 के बजट से सेक्टर को बड़े बूस्टर की उम्मीद है।

 

National Manufacturing Mission: चालू वित्त वर्ष 2025-26 के केंद्रीय बजट में जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी बढ़ाने और नए उद्यमियों को इस क्षेत्र की ओर आकर्षित करने के उद्देश्य से नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन की घोषणा की गई थी। उस समय यह उम्मीद जताई गई थी कि इस पहल से भारत वैश्विक सप्लाई चेन में चीन के एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर सकेगा।

बजट में यह भी कहा गया था कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए प्लग एंड प्ले सुविधा विकसित की जाएगी, जिससे सेक्टर-आधारित क्लस्टरों में उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, एक साल बीतने के बावजूद यह मिशन अब तक जमीन पर नहीं उतर सका है।

अब जबकि वित्त वर्ष 2026-27 का बजट 1 फरवरी को पेश होने जा रहा है, वैश्विक अनिश्चितताओं और अमेरिका द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाए जाने की पृष्ठभूमि में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को एक बड़े बूस्टर डोज की जरूरत महसूस की जा रही है।

रोजगार और राजनीति-दोनों के लिए अहम मैन्युफैक्चरिंग

रोजगारपरक कई निर्यात-आधारित सेक्टरों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, जिसका सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग पर पड़ता है। यह क्षेत्र न केवल प्रत्यक्ष बल्कि बड़े पैमाने पर अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा करता है। ऐसे में आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी सरकार के लिए मैन्युफैक्चरिंग को गति देना बेहद जरूरी हो गया है।

उद्यमियों का कहना है कि किसी भी नई यूनिट की स्थापना में सबसे बड़ी बाधा जमीन की उपलब्धता और उसकी ऊंची कीमत है। इसके अलावा, सैकड़ों नियम हटाए जाने के बावजूद अब भी दर्जनों लाइसेंस और मंजूरियों की जरूरत पड़ती है।

सिंगल विंडो सिस्टम अभी भी अधूरा

सरकार ने भले ही सिंगल विंडो पोर्टल शुरू किया हो, लेकिन उद्यमियों का कहना है कि एक मंजूरी मिलने के बाद भी वे बाकी अनुमतियों से मुक्त नहीं हो पाते। जॉब वर्क के लिए अलग-अलग स्थानों पर जाना पड़ता है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ती है। इसके विपरीत, प्लग एंड प्ले मॉडल में सभी सुविधाएं एक ही स्थान पर मिलती हैं और उद्यमी केवल मशीनें लगाकर उत्पादन शुरू कर सकता है।

आयात बढ़ा, मैन्युफैक्चरिंग पर दबाव

उद्यमियों के अनुसार, आयात में बढ़ोतरी सेवा क्षेत्र को नहीं, बल्कि वस्तु निर्माण को प्रभावित करती है। तमाम प्रयासों के बावजूद भारत का आयात, निर्यात से कहीं अधिक है। वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल-दिसंबर के दौरान वस्तु निर्यात 330 अरब डॉलर, जबकि आयात 576 अरब डॉलर रहा।

सेवा निर्यात की वृद्धि दर वस्तु निर्यात से लगभग दोगुनी है। यही रुझान जारी रहा तो जल्द ही भारत का सेवा निर्यात, वस्तु निर्यात से आगे निकल जाएगा, जो मैन्युफैक्चरिंग के लिए चेतावनी है।

25 साल से लक्ष्य वही, हिस्सेदारी वहीं

पिछले 25 वर्षों से, चाहे कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार हो या वर्तमान राजग सरकार, जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी बढ़ाने के प्रयास किए जाते रहे हैं। इसके बावजूद यह हिस्सेदारी 16-17 प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ सकी।

संप्रग काल में यह आंकड़ा लगभग 14 प्रतिशत था और लक्ष्य 25 प्रतिशत तय किया गया था, जो आज भी अधूरा है।

भारत में उत्पादन महंगा क्यों?

उद्यमियों का कहना है कि भारत में मैन्युफैक्चरिंग की लागत अधिक है। वैश्विक प्रतिस्पर्धी देश—चीन, वियतनाम और इंडोनेशिया में उत्पादन लागत भारत की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत कम है।
भारत में उद्योगों को मिलने वाले कर्ज की ब्याज दर, औद्योगिक बिजली और लॉजिस्टिक लागत अधिक होने से कुल उत्पादन महंगा पड़ता है। यही कारण है कि कई कारोबारी उत्पादन करने के बजाय आयात को प्राथमिकता देने लगते हैं।

निजी भागीदारी से समाधान की उम्मीद

वियतनाम समेत कई देशों में निजी कंपनियां मैन्युफैक्चरिंग के लिए पूरी तरह विकसित औद्योगिक क्षेत्र और भवन तैयार करती हैं, जहां उद्यमी एक निश्चित शुल्क देकर तुरंत उत्पादन शुरू कर सकता है। भारत में भी निजी क्षेत्र की भागीदारी से ऐसी सुविधाएं विकसित करने की जरूरत है।

निर्मित कुमार मिश्र (सीआईएस) का कहना है कि बजट में इस दिशा में ठोस प्रावधान किए जाने चाहिए।
वहीं अनिल भारद्वाज का मानना है कि सस्ती जमीन और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग के लिए टेक्नोलॉजी सपोर्ट जरूरी है। कच्चे माल के आयात पर शुल्क घटाने या हटाने से भी उद्योग को राहत मिल सकती है।

क्वालिटी कंट्रोल पर असमंजस

क्वालिटी कंट्रोल को लेकर भी सरकार असमंजस में दिख रही है। कुछ सेक्टरों में नियम लागू कर बाद में वापस ले लिए गए, जिससे उद्योग जगत में असंतोष है। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिके रहने के लिए हर स्तर पर गुणवत्ता अनिवार्य होनी चाहिए और भारत को इस मामले में चीन से अलग, बेहतर मॉडल अपनाना होगा।

भारत अगर सच में चीन का विकल्प बनना चाहता है, तो घोषणाओं से आगे बढ़कर नीतियों का जमीन पर क्रियान्वयन करना होगा। नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन केवल एक योजना नहीं, बल्कि रोजगार, निर्यात और आर्थिक स्थिरता की कुंजी है। आगामी बजट सरकार के इरादों की असली परीक्षा होगा- क्या मैन्युफैक्चरिंग सिर्फ भाषणों में रहेगी या उत्पादन में बदलेगी?