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वर्षा

 

भीगे बिना इस बस्ती में कौन रह गया बशर, है, लौटती जिसके लिये बूंद, बारिश की हर बरस। भीगे बिना इस बस्ती में, कौन रह गया बशर.

गिर उठ के चल रही हैं सागर में सब लहर, तू भी उठ खड़ा हो होने वाली है सहर। ..... भीगे बिना इस बस्ती में, कौन रह गया बशर.

शिव जी ने पी लिया था दुनिया के लिये ज़हर, बरखा मनाने आती है ले कुदरत के रंग बहर ।

भीगे बिना इस बस्ती में, कौन रह गया बशर.

सूरज से तपी धरती झेल गर्मीयों के कहर, आई है शीतल वर्षा थोड़ी देर मन ठहर । भीगे बिना इस बस्ती में, कौन रह गया बशर.

गर्मी सर्दी बरखा सब कुदरत की हैं मेहर, दिन के आठों पहर। "राज" जीवन में हैं ज़रूरी भीगे बिना इस बस्ती में, कौन रह गया बशर.

राज शारदा