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सोनम वांगचुक के पिता ने भी किया था अनशन, 1984 में इंदिरा गांधी को जाना पड़ा था लेह

सोनम वांगचुक के अनशन के बीच 1984 का इतिहास फिर चर्चा में है। उनके पिता सोनम वांगयाल ने भी लद्दाख के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल की थी, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी लेह पहुंची थीं। जानिए इस ऐतिहासिक आंदोलन की पूरी कहानी।
 

Sonam Wangchuk Father: सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक के अनिश्चितकालीन अनशन ने एक बार फिर लद्दाख के अधिकारों की बहस को राष्ट्रीय स्तर पर ला दिया है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह संघर्ष नया नहीं है। करीब 42 वर्ष पहले, उनके पिता सोनम वांगयाल ने भी लद्दाख के लोगों के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल की थी। उस आंदोलन का असर इतना बड़ा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं लेह पहुंचकर उनसे मिली थीं।

1984 में पिता ने शुरू की थी भूख हड़ताल

साल 1984 में सोनम वांगयाल ने लद्दाख के लोगों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर अनशन शुरू किया था। उस समय यह मुद्दा पूरे क्षेत्र में तेजी से उभर रहा था और आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा। बढ़ते जनसमर्थन और आंदोलन की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी लेह पहुंचीं और वांगयाल से मुलाकात कर उनकी मांगों पर सकारात्मक पहल का भरोसा दिया।

1989 में पूरी हुई बड़ी मांग

हालांकि 1984 में तत्काल कोई फैसला नहीं हुआ, लेकिन आंदोलन का प्रभाव लंबे समय तक बना रहा। आखिरकार 1989 में केंद्र सरकार ने संवैधानिक आदेश जारी करते हुए लद्दाख की आठ जनजातीय समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्रदान किया। इसे उस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

कौन थे सोनम वांगयाल?

सोनम वांगयाल केवल सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं थे, बल्कि एक प्रसिद्ध पर्वतारोही और लद्दाख के प्रमुख जननेता भी रहे। वर्ष 1965 में मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने माउंट एवरेस्ट फतह कर इतिहास रचा था। बाद में उन्होंने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई और लद्दाख के सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाई।

अब बेटे सोनम वांगचुक फिर चर्चा में

इन दिनों सोनम वांगचुक अपने आंदोलन और अनिश्चितकालीन अनशन को लेकर सुर्खियों में हैं। स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया। पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश और चिकित्सकीय सलाह के आधार पर की गई, जबकि आंदोलन से जुड़े लोगों ने इसे जबरन हटाने की कार्रवाई बताया है।

पिता और बेटे के आंदोलन में दिखती है समानता

1984 में पिता सोनम वांगयाल ने लद्दाख के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल की थी और चार दशक बाद उनके बेटे सोनम वांगचुक भी क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को लेकर अनशन कर रहे हैं। दोनों आंदोलनों का केंद्र लद्दाख के लोगों के अधिकार और क्षेत्रीय हित रहे हैं। यही वजह है कि 1984 की तस्वीरें और घटनाएं एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं।