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बागन में बसंत

 

ऋतुराज वसंत पंचमी और वाग्देवी सरस्वती का संबंध अनेक सदियों से चला आ रहा है। सरस्वती की पूजा आराधना का अनूठा पर्व वसंत पंचमी तो यह ऋतुराज बसंत के स्वागत का पर्व भी है। वसंत समऋतु का परिचयक है और देव, ऋषि, कवि साधारण जन  सभी को संभाव से आहादित करता है। वसंत पंचमी के दिन मां शारदे की उपासना कर ज्ञान का वरदान प्राप्त किया जाता है तो यह दिन कामदेव की पूजा को भी समर्पित है।

भारतीय शास्त्रों और काव्य कृतियों में वाग्देवी सरस्वती की महिमा कई रूप में व्यक्त की गई है। ऋग्वेद में सरस्वती नदी मातृका और वाग्देवी के रूप में वर्णित हैं। देवी रूप में पवित्रता , शुद्धि ,समृद्धि और शक्ति प्रदाता मानी गई है। वहां उनका संबंध पूछा इंद्र और मरुद्ध से बताया गयाहै। 

सरस्वती समस्त विधाओं की अधिष्ठात्री हैं। यश उन्हीं के धवल अंग की ज्योत्सना है। युगों युगों से सर्जकगण उनके पावन चरणों का स्मरण करके ही अपना काव्य कम प्रारंभ करते थे। 

भारतीय प्रयोग परंपरा वर्ष भर में छह ऋतुओं के चक्र को स्वीकृति है। यह ऋतु है ग्रीष्म, वर्षा ,शरद ,हेमंत ,शिशिर और वसंत। यूं तो सभी ऋतुओं की अपनी महिमा है लेकिन सभी ऋतुओं का राजा बसंती माना गया है। 

परिवर्तन प्रकृति का स्वाभाविक धर्म है जो विभिन्न ऋतुओं के माध्यम से सरकार होता है। रितु शब्द के मूल में ऋत है जिसका अर्थ ही है स्वाभाविक व्यवस्था या भौतिक एवं आध्यात्मिक निश्चित नियम।

ऋतुराज बसंत के आगमन से प्रकृति युवा होती है। धरती अपना रूप सवारने लगती है।

निराला जी ने वसंत की माला से शारदा के श्रृंगार होली जैसे पर्व के माध्यम से राष्ट्र प्रेम की अभिव्यक्ति और वसंत से उपजे मुक्ति के अनुभवों को कविता के माध्यम से कुछ इस तरह से व्यक्त करते हैं- 

हंसी के तार होते हैं यह बहार के दिन
हृदय के हार के होते हैं यह बहार के दिन 
नवीनता की आंखें चार जो हुई उनसे। कहा की प्यार के होते हैं यह बहार के दिन"

 फरवरी का महीना महीना नहीं होता 
     साल की डाल पर मिला हुआ 
      एक बड़ा सा फूल होता है 
        थके हुए समय के बीच 
      फुर्सत का एक दिन होता है 
       एक गुनगुना गीत होता है 
       जाड़े के खर्राटे सन्नाटे में भी 
         ऐसा भी एक वसंत होता है