UP का ऐसा अनोखा गांव, जहां रक्षाबंधन पर भाइयों की कलाईयां रहती हैं सूनी, वजह जानकर रह जाएंगे हैरान
रक्षाबंधन भारतीय समाज में भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और विश्वास का पर्व माना जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और भाई उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं। बाजारों से लेकर घरों तक त्योहार की रौनक दिखाई देती है, लेकिन एक ऐसी जगह भी है जहां सदियों से भाइयों की कलाई पर राखी नहीं बांधी जाती। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा क्यों, तो आइए जानते है इसके बारे में कि आखिर वो कौन सा स्थान है, जहां रक्षाबंधन पर भी भाईयों की कलाईयां सूनी रहती है।
जानें कौन सी जगह हैं
दरअसल, हम बात कर रहे हैं उत्तप प्रदेश के संभल जिले के बेनीपुर चक गांव की। गांव में रक्षाबंधन को लेकर एक ऐसी लोककथा पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसने यहां की परंपरा को दूसरे गांवों से अलग बना दिया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस परंपरा की जड़ें अलीगढ़ के अतरौली क्षेत्र के सेमराई गांव से जुड़ी एक पुरानी पारिवारिक घटना और उसके बाद हुए पलायन से जुड़ी हैं।
राखी सिर्फ धागा नहीं, वचन का प्रतीक थी
भारतीय परंपरा में राखी को महज एक धागा नहीं माना गया है। यह भाई-बहन के बीच स्नेह, भरोसे, जिम्मेदारी और सुरक्षा के वचन का प्रतीक रही है। ग्रामीण समाज में राखी के रिश्ते को लेकर कई तरह की लोककथाएं भी सुनने को मिलती हैं।
बेनीपुर चक की कहानी भी इसी तरह की एक लोकमान्यता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस गांव में रहने वाले यादव परिवार के पूर्वज कभी अलीगढ़ जिले की अतरौली तहसील के सेमराई गांव में रहते थे। उस समय गांव में ठाकुर और यादव परिवारों के बीच रक्षाबंधन पर राखी बांधने की परंपरा थी। राखी का रिश्ता केवल त्योहार तक सीमित नहीं था, बल्कि इसे एक सामाजिक वचन और सम्मान से जोड़कर देखा जाता था।
एक घोड़ी ने बदल दी रिश्ते की कहानी
गांव में पीढ़ियों से सुनाई जाने वाली कथा के मुताबिक, एक बार यादव परिवार की बेटी ने ठाकुर परिवार के एक सदस्य को राखी बांधी। राखी बांधने के बाद उसने उपहार में ठाकुर परिवार की घोड़ी मांग ली।
उस दौर में घोड़ा या घोड़ी सिर्फ सवारी का साधन नहीं था। ग्रामीण समाज में यह परिवार की हैसियत और संपन्नता से भी जुड़ा हुआ माना जाता था। लोककथा के अनुसार, ठाकुर परिवार ने राखी के रिश्ते का मान रखते हुए घोड़ी दे दी।
कहा जाता है कि यही घटना आगे चलकर दोनों परिवारों के बीच राखी के रिश्ते को एक अलग अर्थ देने वाली बनी।
दूसरी राखी के साथ सामने आई जमीन की मांग
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। इसके बाद लोकमान्यता में एक दूसरी घटना का जिक्र मिलता है। बताया जाता है कि ठाकुर परिवार की बेटी ने यादव परिवार के एक सदस्य को राखी बांधी और बदले में यादव परिवार की पूरी जमीन-जायदाद मांग ली। राखी के रिश्ते में दिए गए वचन को निभाने की परंपरा का हवाला देते हुए यादव परिवार ने जमीन-जायदाद देने की बात स्वीकार कर ली। इसके बाद परिवार के सामने अपना पुराना गांव छोड़ने की स्थिति पैदा हो गई।
स्थानीय कथा के मुताबिक, यादव परिवार सेमराई गांव से निकलकर संभल क्षेत्र की ओर आया और बाद में बेनीपुर चक में बस गया। इसी घटना को गांव में रक्षाबंधन की परंपरा बदलने की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है।
जमीन छूटी तो बदल गई परंपरा
ग्रामीण समाज में जमीन का महत्व सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहा है। जमीन परिवार की आर्थिक स्थिति, सामाजिक पहचान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ी रही है। ऐसे में जमीन छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर बसना किसी भी परिवार के लिए बड़ा बदलाव होता था।
बेनीपुर चक की लोककथा में भी जमीन और पलायन का यही संबंध दिखाई देता है। हालांकि घोड़ी और जमीन-जायदाद से जुड़ी इस पूरी कहानी की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे प्रमाणित इतिहास के बजाय स्थानीय लोकविश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपरा के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।
पीढ़ियां बदलीं, लेकिन परंपरा कायम रही
समय बीतता गया। परिवार की पीढ़ियां बदलती रहीं और लोग अलग-अलग जगहों पर जाकर बसते गए। लेकिन स्थानीय मान्यता के मुताबिक, रक्षाबंधन पर राखी न बांधने की परंपरा आगे भी चलती रही।
आज भी बेनीपुर चक में रक्षाबंधन का माहौल आसपास के गांवों जैसा नहीं होता। यहां भाइयों की कलाई पर राखी बांधने की परंपरा नहीं है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, शादी के बाद गांव में आने वाली बहुएं भी इस परंपरा का पालन करती हैं और रक्षाबंधन के दिन अपने भाइयों को राखी बांधने के लिए मायके नहीं जातीं।