अस्तित्व की जंग: किन्नर जिहाद
Jan 30, 2026, 23:49 IST
न पुरुष की पूरी काया है,
न नारी का श्रृंगार मिला,
मझधार में अटकी कश्ती को,
न कोई तट-आधार मिला।
जिसे 'दुआ' का हक़ सौंपा,
उसे 'तिरस्कार' की मार मिली,
इस जग के मेले में देखो,
बस उपहासों की हार मिली।
यह लड़ाई है खुद से खुद की,
यह जिहाद है
अपनी पहचान का।
नफरत की तंग गलियों में,
सफर है बढ़ते सम्मान का।
न कोई 'अधूरी' मूरत है,
हम ईश्वर की ही रचना हैं,
दकियानूसी इस दुनिया के,
बंधनों से अब बचना है।
कलंक नहीं हम माथे का,
हम मानवता का हिस्सा हैं,
इतिहास के पन्नों में दर्ज,
एक अनकहा सा किस्सा हैं।
✍🏼 अमित श्रीवास्तव उर्फ़-अस्क
न नारी का श्रृंगार मिला,
मझधार में अटकी कश्ती को,
न कोई तट-आधार मिला।
जिसे 'दुआ' का हक़ सौंपा,
उसे 'तिरस्कार' की मार मिली,
इस जग के मेले में देखो,
बस उपहासों की हार मिली।
यह लड़ाई है खुद से खुद की,
यह जिहाद है
अपनी पहचान का।
नफरत की तंग गलियों में,
सफर है बढ़ते सम्मान का।
न कोई 'अधूरी' मूरत है,
हम ईश्वर की ही रचना हैं,
दकियानूसी इस दुनिया के,
बंधनों से अब बचना है।
कलंक नहीं हम माथे का,
हम मानवता का हिस्सा हैं,
इतिहास के पन्नों में दर्ज,
एक अनकहा सा किस्सा हैं।
✍🏼 अमित श्रीवास्तव उर्फ़-अस्क