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अस्तित्व की जंग: किन्नर जिहाद 
 

 
 ​न पुरुष की पूरी काया है,
   न नारी का श्रृंगार मिला,
   मझधार में अटकी कश्ती को, 
   न कोई तट-आधार मिला।
  जिसे 'दुआ' का हक़ सौंपा, 
  उसे 'तिरस्कार' की मार मिली,
  इस जग के मेले में देखो, 
 बस उपहासों की हार मिली।
 ​यह लड़ाई है खुद से खुद की, 
        यह जिहाद है 
    अपनी पहचान का। 
 नफरत की तंग गलियों में,
 सफर है बढ़ते सम्मान का।
​  न कोई 'अधूरी' मूरत है,
   हम ईश्वर की ही रचना हैं,
  दकियानूसी इस दुनिया के,
  बंधनों से अब बचना है।
  ​कलंक नहीं हम माथे का, 
  हम मानवता का हिस्सा हैं,
  इतिहास के पन्नों में दर्ज, 
  एक अनकहा सा किस्सा हैं।
✍🏼 अमित श्रीवास्तव उर्फ़-अस्क