बुझती सांसें थकती धरती
Updated: Jun 5, 2026, 16:26 IST
कितनी अद्भुत पृथ्वी हमारी ।
इस दुनिया में सबसे प्यारी ।
पृथ्वी पर ही जीवन अपना ।
पूरा होता यहीं हर सपना ।
यही है मातृ भूमि हमारी ।
सारे जग में सबसे न्यारी ।
पर अब इसकी दशा बुरी है ।
चारों ओर दूषित हवा घुली है ।
देखो ! धरती मां है सुबकती ।
दुःखी हो जैसे आहें भरती ।
कौन सुनेगा इन आहों को ?
रोकेगा दूषित हवाओं को ?
नीला अंबर हुआ है काला ।
हवा हुई है विषैली ।
हरियाली की चादर कैसे ,
हो गई है मैली ?
यदि प्रदूषण नहीं रुका तो,
कैसे बचेगी प्यारी धरती ?
पेड़ यदि कटते जाएंगे ।
शुद्ध हवा कैसे पाएंगे ?
कब तक ये अत्याचार चलेगा ?
धरती मां की रक्षा कौन करेगा ?
कब तक खामोश रहेगी यह धरती, और सहेगी अत्याचार,
कण-कण इसका चीख रहा है, सुन लो इसकी पुकार ।
लेखिका- प्रगति दत्त (अलीगढ़)