DIG वैभव कृष्ण की पहल से उजागर हुआ पंडी गांव का सच: विकास आगे निकल गया, गांव पीछे रह गया
Story Writer: Amit Srivastav
कहानी की शुरुआत:
मुगलसराय स्टेशन से चंदौली की तरफ 19 km चलो। NH-233 पर। बाएं हाथ पर "पंडी गांव 2 KM" का टूटा हुआ साइनबोर्ड मिलेगा।
मेन रोड से अंदर कच्ची पटरी उतरते ही कहानी शुरू हो जाती है।
एक तरफ 80 की स्पीड से ट्रक निकल रहे हैं। धूल उड़ रही है।
दूसरी तरफ पंडी गांव की गली में बूढ़ी अम्मा धीरे-धीरे झाड़ू लगा रही हैं। धूल बैठ रही है।
यही पंडी गांव का सच है - दुनिया तेज भाग रही है, पर ये गांव अपनी चाल से चल रहा है।
ऐसी कहानी का सच जानने निकल पड़े वाराणसी के DIG वैभव कृष्ण।
बात 14 जून की है जब पुलिस का काफिला कहीं ईट तो कहीं डामर की संकरी सड़क से गुजरते हुए गांव तक पहुंचा।
बनारस से करीब 200 किलोमीटर की दूर चंदौली के नवगढ़ क्षेत्र के सुदूर पंडी गांव जहां पर गांव की महिलाओं की दुनिया गांव के पगडंडियों जंगलों और अपने घर आंगन तक ही सिमटी रह गई।
उम्र बीत गई लेकिन यहां की महिलाएं कभी गांव की सीमा लांघ कर बाहर नहीं
जा सकी। शहर मानो उनके लिए सपना ही बन कर रह गया। सपने तो बहुत थे लेकिन जिम्मेदारियां और अभावों ने उनके सपनों को कैद कर रखा था। इन महिलाओं की यही इच्छा डीआईजी वाराणसी परिक्षेत्र वैभव कृष्ण के मन को छू गई। और तभी उन्होंने यह निर्णय लिया कि मिशन शक्ति अभियान के अंतर्गत लगभग 40 महिलाओं को वाराणसी लाया जाएगा ताकि पहली बार देख सकेंगी वाराणसी स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर।
पंडी गांव की 3 असली कहानियां:
1. कहानी नाम की: "पंडी" पड़ा कैसे? गांव के सबसे बुजुर्ग रामबदन काका, 92 साल, बताते हैं:
"पहले यहां पांडे ब्राह्मणों की बस्ती थी। 5 पीढ़ी पहले। फिर बाढ़ आई, गंगा ने जमीन काट दी। पांडे लोग भाग गए। बचे जो 3-4 घर, वो 'पंडित वाले' से 'पंडी' हो गए। अब यहां पंडित 4 घर हैं, बाकी यादव, मौर्या, दलित बस्ती है।"
नाम ब्राह्मण वाला रह गया, पर गांव सबका हो गया।
2. कहानी रोड की: हाइवे ने बर्बाद भी किया, बसा भी दिया
2010 से पहले पंडी गांव तक पक्की सड़क नहीं थी। दुल्हन डोली में 2 km कीचड़ ढोकर आती थी।
2012 में NH-233 बना। गांव के लड़के खुश हुए - "अब शहर जाएंगे"।
सच में गए भी। आज गांव के 80 लड़के सूरत में पावरलूम पर हैं। महीने में 12 हजार भेजते हैं। उसी पैसे से घर पक्के हुए।
पर नुकसान भी हुआ। हाइवे के बाद गांव की जमीन के रेट बढ़े। बाहर के बिल्डर ने 20 बीघा खरीद ली। खेत घट गए। अब जो लड़के शहर से लौटते हैं, उनके पास खेत नहीं, सिर्फ प्लॉट है।
पंडी गांव की कहानी: रोड ने जेब भरी, पर जड़ काट दी।
पंडी गांव की कहानी: इज्जत बचाने के चक्कर में, इज्जत ही दांव पर लग जाती है।
- गांव का आज का सच:
आज पंडी गांव में 3 चीजें कॉमन हैं:
1. हाथ में मोबाइल: सबके पास Jio है। लड़कियां Instagram रील बनाती हैं - "Pandi village vibes"। बैकग्राउंड में हाइवे का शोर आता है।
2. छत पर सोलर: लाइट जाती है तो इन्वर्टर नहीं, सोलर पैनल। मोदी जी की योजना से लगा है। शाम को बच्चे उसी के नीचे पढ़ते हैं।
3. दहलीज पर ताला: दिन में 70% घर बंद रहते हैं। लोग खेत या शहर गए हैं। गांव सिर्फ शाम 6 से रात 10 तक "जिंदा" होता है। जब मजदूरी वाले लौटते हैं।
पंडी गांव की सबसे बड़ी कहानी ये है:
ये गांव ना पूरी तरह शहर बना, ना पूरी तरह गांव रहा। ये "बीच वाला भारत" है।
NH-233 पर गाड़ियां 100 की स्पीड से निकल जाती हैं। कोई रुककर नहीं पूछता "पंडी गांव कैसा है?"
पर पंडी गांव वाला हर शाम हाइवे को देखता है और सोचता है "काश हम भी इस रफ्तार में शामिल हो पाते"।
पंडी गांव की कहानी कोई हेडलाइन नहीं बनेगी। पर यही वो कहानी है जिससे भारत बनता है।