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आज का फैशन
 

 

आज का फैशन
केवल वस्त्रों का परिवर्तन नहीं,
विचारों और जीवन-मूल्यों का भी प्रश्न बन गया है।

फटे वस्त्र आधुनिकता का प्रतीक कहे जाते हैं,
पर कहीं चरित्र के धागे भी तो नहीं उधड़ रहे?

रातों की आवारगी,
घर लौटने की अनिश्चितता,
माता-पिता की आँखों में
अनगिनत चिंताओं का अंधकार भर देती है।

दिखावे की चमक में
शिक्षा का प्रकाश धूमिल पड़ने लगा है।
ज्ञान से अधिक प्रदर्शन,
संस्कार से अधिक उपभोग,
और आवश्यकता से अधिक अपव्यय—
मानो सफलता की नई परिभाषा बन गई हो।

भोगवाद की अंधी दौड़
मनुष्य को वस्तुओं का स्वामी नहीं,
उनका दास बना रही है।

रिश्तों में संवाद कम,
स्वार्थ अधिक दिखाई देता है।
अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई
समाज के संतुलन पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।

फूहड़ता को स्वतंत्रता,
और उच्छृंखलता को आधुनिकता समझ लेना
सभ्यता की सबसे बड़ी भूल है।

फैशन का विरोध नहीं,
पर ऐसा फैशन अवश्य चाहिए
जो व्यक्तित्व को निखारे,
संस्कारों को संजोए,
ज्ञान को सम्मान दे,
और मनुष्य को मनुष्य बनाए।

क्योंकि वस्त्रों की सुंदरता क्षणिक होती है,
किन्तु चरित्र की गरिमा
युगों तक पहचानी जाती है।

डॉ बलवंत सिंह राणा 
हिमाचल प्रदेश 
सोलन