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आपका फोन खुद-ब-खुद स्लो हो रहा! पीछे छिपी है कंपनियों की ये स्मार्ट ट्रिक, कर रही हैं सेटिंग!

क्या आपका स्मार्टफोन जानबूझकर स्लो किया जाता है? ‘प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस’ पर यूरोपीय यूनियन सख्ती करने जा रहा है। नए नियमों से फोन की लाइफ बढ़ेगी, बैटरी बेहतर होगी और रिपेयर आसान बनेगा। इसका असर भारत समेत ग्लोबल स्मार्टफोन मार्केट पर भी पड़ सकता है।
 

Planned Obsolescence: अगर आपका स्मार्टफोन कुछ साल बाद अचानक स्लो होने लगे, बैटरी जल्दी खत्म होने लगे और बार-बार चार्ज करना पड़े, तो इसे सिर्फ तकनीकी समस्या मानना पूरी सच्चाई नहीं हो सकती। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे कंपनियों की एक रणनीति भी हो सकती है, जिसे ‘प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस’ कहा जाता है।

यह एक ऐसा मॉडल है, जिसमें प्रोडक्ट को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि समय के साथ उसकी उपयोगिता कम होती जाए और उपभोक्ता नया डिवाइस खरीदने के लिए प्रेरित हो।

क्या है ‘Planned Obsolescence’ और कैसे करता है काम?

‘प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस’ का मतलब है किसी प्रोडक्ट की उम्र को सीमित करना, लेकिन अचानक खराब करके नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उसकी परफॉर्मेंस गिराकर।

स्मार्टफोन के मामले में यह कई तरीकों से दिखता है, बैटरी की क्षमता कम होना, सॉफ्टवेयर अपडेट बंद हो जाना, और रिपेयर के लिए जरूरी पार्ट्स का आसानी से उपलब्ध न होना। नतीजा यह होता है कि फोन काम तो करता है, लेकिन इस्तेमाल के लायक नहीं लगता और नया खरीदना मजबूरी बन जाता है।

बैटरी क्यों बनती है सबसे बड़ी समस्या?

स्मार्टफोन की बैटरी समय के साथ खराब होना स्वाभाविक है, लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। 2017 में उस समय बड़ा विवाद हुआ था जब Apple ने स्वीकार किया कि वह पुराने iPhones की स्पीड कम कर रहा था।

कंपनी ने इसे बैटरी की सुरक्षा से जोड़ा, लेकिन इससे यह साफ हो गया कि बैटरी की स्थिति सीधे डिवाइस की परफॉर्मेंस को प्रभावित करती है। इसके बाद ‘बैटरी हेल्थ’ जैसे फीचर्स आए, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

रिमूवेबल बैटरी क्यों हो गई गायब?

पहले स्मार्टफोन में बैटरी बदलना आसान होता था, लेकिन अब ज्यादातर डिवाइस सील्ड डिजाइन में आते हैं। कंपनियां इसे बेहतर डिजाइन, वॉटरप्रूफिंग और मजबूती का कारण बताती हैं, लेकिन इससे रिपेयर महंगा और जटिल हो गया है। कई मामलों में यूजर को बैटरी बदलने के बजाय पूरा फोन बदलना पड़ता है।

रिपेयर से ज्यादा रिप्लेसमेंट पर जोर

आज के स्मार्टफोन इकोसिस्टम में ऐसा माहौल बन गया है, जहां डिवाइस को रिपेयर करना कठिन और महंगा होता जा रहा है। स्पेयर पार्ट्स की सीमित उपलब्धता, सॉफ्टवेयर कंट्रोल और सर्विस पॉलिसी के कारण यूजर नए फोन की ओर ज्यादा झुकता है। यही कारण है कि औसतन लोग 2 से 3 साल में अपना स्मार्टफोन बदल देते हैं।

EU की सख्ती: क्या बदलने जा रहा है?

यूरोपीय यूनियन अब इस पूरे ट्रेंड को बदलने की तैयारी में है। नए नियमों के तहत कंपनियों को ऐसे स्मार्टफोन बनाने होंगे जो ज्यादा टिकाऊ हों और आसानी से रिपेयर किए जा सकें।

बैटरी को लंबी उम्र वाला बनाना, स्पेयर पार्ट्स को लंबे समय तक उपलब्ध कराना और सॉफ्टवेयर सपोर्ट बढ़ाना इन नियमों का हिस्सा होगा। साथ ही, थर्ड-पार्टी रिपेयर को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

भारत और दुनिया पर क्या होगा असर?

हालांकि ये नियम यूरोप के लिए बनाए जा रहे हैं, लेकिन इनका असर वैश्विक स्तर पर देखने को मिल सकता है। कंपनियां आमतौर पर अलग-अलग बाजारों के लिए पूरी तरह अलग डिजाइन नहीं बनातीं, इसलिए बदलाव अन्य देशों तक भी पहुंच सकते हैं। भारत में भी ‘राइट टू रिपेयर’ जैसे प्रयास शुरू हो चुके हैं, जो आने वाले समय में यूजर्स को ज्यादा अधिकार और विकल्प दे सकते हैं।