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7 साल में 4 प्रधानमंत्री, 3 ने दिया इस्तीफा: आखिर क्यों अस्थिर हो रही है ब्रिटेन की राजनीति?

 

ब्रिटेन की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के इस्तीफे ने न केवल लेबर पार्टी बल्कि पूरे यूरोप की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। महज दो साल पहले भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई लेबर सरकार अब नेतृत्व संकट का सामना कर रही है।

कीर स्टार्मर का राजनीतिक सफर किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं है। 2 सितंबर 1962 को जन्मे स्टार्मर एक साधारण परिवार से आते हैं। उनके पिता एक टूल मेकर और मां नर्स थीं। राजनीति में आने से पहले उन्होंने कानून के क्षेत्र में बड़ी पहचान बनाई और ब्रिटेन के Director of Public Prosecutions जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी कार्य किया।

क्या है लेबर पार्टी का इतिहास?

ब्रिटेन की लेबर पार्टी की स्थापना वर्ष 1900 में मजदूरों और कर्मचारियों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से हुई थी। पार्टी सामाजिक न्याय, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और श्रमिक अधिकारों को प्राथमिकता देने के लिए जानी जाती है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से लेकर आधुनिक दौर तक लेबर पार्टी ब्रिटेन की दो सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों में शामिल रही है। पूर्व प्रधानमंत्री Tony Blair के नेतृत्व में पार्टी ने 1997 में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी।

कैसे बने प्रधानमंत्री?

2019 के आम चुनाव में लेबर पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद कीर स्टार्मर ने पार्टी की कमान संभाली और उसकी छवि को नए सिरे से गढ़ने का प्रयास किया। उनके नेतृत्व में 2024 के आम चुनाव में लेबर पार्टी ने शानदार जीत हासिल की और 14 साल बाद सत्ता में वापसी की।

आखिर क्यों देना पड़ा इस्तीफा?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार स्टार्मर के सामने कई बड़ी चुनौतियां थीं।

देश की अर्थव्यवस्था अपेक्षित गति से नहीं बढ़ सकी, महंगाई का दबाव बना रहा, स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ बढ़ता गया और आव्रजन जैसे मुद्दों पर जनता सरकार से नाराज दिखाई दी।

इसके अलावा हाल के स्थानीय चुनावों में लेबर पार्टी के खराब प्रदर्शन ने पार्टी के भीतर असंतोष को बढ़ा दिया। कई सांसदों और नेताओं को लगने लगा कि स्टार्मर के नेतृत्व में अगला चुनाव जीतना मुश्किल हो सकता है।

यही कारण माना जा रहा है कि बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच उन्होंने पद छोड़ने का फैसला किया।आखिर क्यों अस्थिर हो रही है ब्रिटेन की राजनीति?

दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्रों में से एक माने जाने वाले यूनाइटेड किंगडम में पिछले कुछ वर्षों के दौरान राजनीतिक अस्थिरता लगातार बढ़ती दिखाई दी है। जिस देश में कभी प्रधानमंत्री कई-कई वर्षों तक सत्ता में बने रहते थे, वहीं पिछले 7 वर्षों में नेतृत्व परिवर्तन की रफ्तार काफी तेज हो गई है।

 2019 से 2026 के बीच ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का सफर । चार अलग-अलग प्रधानमंत्री देश का नेतृत्व कर चुके हैं। इनमें से तीन प्रधानमंत्रियों ने अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

पिछले 7 वर्षों के प्रधानमंत्री

सबसे पहले 2019 में प्रधानमंत्री बने Boris Johnson। ब्रेक्सिट को लागू कराने के बाद उनकी लोकप्रियता बढ़ी, लेकिन बाद में कई विवादों और अपनी ही पार्टी के सांसदों के विरोध के कारण उन्हें जुलाई 2022 में इस्तीफा देना पड़ा।

उनके बाद Liz Truss प्रधानमंत्री बनीं, लेकिन उनका कार्यकाल ब्रिटिश इतिहास के सबसे छोटे कार्यकालों में शामिल हो गया। आर्थिक नीतियों पर भारी आलोचना के बाद उन्हें मात्र 45 दिनों में पद छोड़ना पड़ा।

इसके बाद Rishi Sunak ने प्रधानमंत्री पद संभाला। उन्होंने 2022 से 2024 तक देश का नेतृत्व किया, लेकिन आम चुनाव में Labour Party की जीत के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा।

2024 में Labour Party के नेता Keir Starmer प्रधानमंत्री बने। उन्होंने लगभग दो वर्षों तक सरकार चलाई, लेकिन स्थानीय चुनावों में खराब प्रदर्शन, जनता के बीच घटती लोकप्रियता और पार्टी के अंदर बढ़ते असंतोष के चलते 2026 में इस्तीफा दे दिया।

क्यों बढ़ रही है राजनीतिक अस्थिरता?

ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन को आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। महंगाई, ऊर्जा संकट, स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता दबाव और आव्रजन जैसे मुद्दों ने सरकारों के लिए मुश्किलें खड़ी कीं।

इसके अलावा जनता की अपेक्षाएं तेजी से बढ़ी हैं। सोशल मीडिया और 24 घंटे के समाचार चक्र के दौर में नेताओं पर लगातार प्रदर्शन करने का दबाव बना रहता है। नतीजतन लोकप्रियता में गिरावट आते ही नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठने लगती है। ऐसा माना जाता है कि 

2019 से 2026 के बीच प्रधानमंत्री बदलने की यह रफ्तार ब्रिटेन के लिए असामान्य है। तुलना करें तो 1997 से 2010 तक केवल दो प्रधानमंत्री—Tony Blair और Gordon Brown—ने देश का नेतृत्व किया था।

लेकिन हाल के वर्षों में लगातार नेतृत्व परिवर्तन ने यह संकेत दिया है कि ब्रिटिश राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही है।

दुनिया और भारत पर प्रभाव

ब्रिटेन विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। वहां की राजनीतिक स्थिरता का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और कूटनीतिक संबंधों पर पड़ता है।
भारत और ब्रिटेन के बीच मुक्त व्यापार समझौते, शिक्षा, निवेश और रक्षा सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे जुड़े हुए हैं। ऐसे में ब्रिटेन में होने वाले राजनीतिक बदलावों पर भारत की भी नजर बनी रहती है।

निष्कर्ष

पिछले 7 वर्षों में ब्रिटेन ने जिस तेजी से प्रधानमंत्री बदले हैं, वह केवल नेतृत्व परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह जनता की बदलती अपेक्षाओं, आर्थिक चुनौतियों और राजनीतिक दलों के भीतर बढ़ती प्रतिस्पर्धा का भी संकेत है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या नया नेतृत्व ब्रिटेन को राजनीतिक स्थिरता की ओर ले जा पाएगा या फिर नेतृत्व परिवर्तन का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।