आतंकी संगठन, राजनीतिक दल या जनता का सहारा? आखिर कौन है हिज़्बुल्लाह? लेबनान से लेकर इज़रायल तक क्यों गूंजता है इसका नाम
हिज़्बुल्लाह आखिर क्या है? क्या यह आतंकी संगठन है, राजनीतिक दल है या लेबनान का सामाजिक संगठन? जानिए इसके गठन, ईरान से संबंध, इज़रायल के साथ संघर्ष, लेबनान की राजनीति में भूमिका और इसके प्रभाव की पूरी कहानी इस विस्तृत एक्सप्लेनर में।
मध्य पूर्व में जब भी इज़रायल, लेबनान और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है, एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में आता है—हिज़्बुल्लाह। कोई इसे आतंकवादी संगठन कहता है, कोई प्रतिरोधी ताकत, तो कोई लेबनान की राजनीति और समाज का मजबूत स्तंभ मानता है। लेकिन आखिर हिज़्बुल्लाह है क्या और इसकी इतनी चर्चा क्यों होती है? आइए पूरी कहानी आसान भाषा में समझते हैं।
लेबनान क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?
लेबनान मध्य पूर्व का एक छोटा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण देश है। इसके पश्चिम में भूमध्य सागर (Mediterranean Sea), उत्तर और पूर्व में सीरिया तथा दक्षिण में इज़रायल स्थित है। क्षेत्रफल में छोटा होने के बावजूद लेबनान लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति और संघर्षों का केंद्र रहा है।
एक समय लेबनान को "मध्य पूर्व का स्विट्ज़रलैंड" कहा जाता था। यहां पर्यटन और व्यापार तेजी से बढ़ रहे थे, लेकिन गृहयुद्ध और क्षेत्रीय संघर्षों ने इसकी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया।
हिज़्बुल्लाह की शुरुआत कैसे हुई?
हिज़्बुल्लाह का अर्थ है "अल्लाह की पार्टी"। इसका गठन 1980 के दशक की शुरुआत में हुआ।
1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी सत्ता में आए। इसके कुछ वर्षों बाद 1982 में इज़रायल ने लेबनान में सैन्य अभियान शुरू किया। इसी दौर में लेबनान के कई शिया समूहों को एकजुट कर एक नए संगठन की नींव रखी गई, जिसे बाद में हिज़्बुल्लाह के नाम से जाना गया।
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने संगठन को प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, हथियार और वैचारिक समर्थन दिया। धीरे-धीरे हिज़्बुल्लाह एक छोटे समूह से बदलकर क्षेत्र की सबसे प्रभावशाली ताकतों में शामिल हो गया।
क्या हिज़्बुल्लाह ईरान का प्रॉक्सी है?
इस सवाल पर दुनिया में अलग-अलग राय है। कई पश्चिमी देशों और सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हिज़्बुल्लाह ईरान का सबसे मजबूत प्रॉक्सी संगठन है, जिसे ईरान वित्तीय और सैन्य सहायता देता है। वहीं दूसरी ओर कुछ विश्लेषक मानते हैं कि हिज़्बुल्लाह ईरान का करीबी सहयोगी जरूर है, लेकिन उसके अपने राजनीतिक और सुरक्षा हित भी हैं। इसलिए वह हर फैसले में पूरी तरह ईरान के निर्देशों पर निर्भर नहीं रहता।
क्या हिज़्बुल्लाह आतंकी संगठन है?
हिज़्बुल्लाह को लेकर दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई है।
अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी और कई अन्य देशों ने इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है। अरब लीग भी इसे इसी नजरिए से देखती है।
हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने हिज़्बुल्लाह को आधिकारिक तौर पर आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल नहीं किया है। कुछ देश इसे एक प्रतिरोधी आंदोलन और राजनीतिक संगठन के रूप में देखते हैं।
सिर्फ हथियार नहीं, राजनीति में भी मजबूत पकड़
हिज़्बुल्लाह केवल एक सशस्त्र संगठन नहीं है। यह लेबनान की राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। 1992 में इसने पहली बार चुनावी राजनीति में कदम रखा। वर्तमान में लेबनान की संसद में इसके सांसद मौजूद हैं और इसके सहयोगी दल भी राजनीतिक प्रभाव रखते हैं। हालांकि हिज़्बुल्लाह लेबनान की सरकार नहीं है, लेकिन वह देश की राजनीतिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
सामाजिक सेवाओं के कारण भी मजबूत है हिज़्बुल्लाह
हिज़्बुल्लाह की ताकत केवल हथियारों और राजनीति तक सीमित नहीं है। संगठन स्कूल, अस्पताल, मेडिकल सेंटर, एम्बुलेंस सेवाएं और सामाजिक कल्याण कार्यक्रम भी चलाता है। लेबनान के कई इलाकों में लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। यही वजह है कि लेबनान की आबादी का एक बड़ा वर्ग इसे समर्थन भी देता है।
लेबनानी सरकार इसे नियंत्रित क्यों नहीं कर पाती?
सैद्धांतिक रूप से लेबनान की सरकार पूरे देश में कानून लागू कर सकती है, लेकिन व्यवहारिक स्थिति काफी जटिल है।
हिज़्बुल्लाह की अपनी सैन्य क्षमता है, राजनीतिक प्रभाव है और समाज के एक बड़े हिस्से का समर्थन भी हासिल है। इसके अलावा उसे ईरान का समर्थन प्राप्त है। इसी कारण लेबनान में वर्षों से यह बहस चल रही है कि हथियार सिर्फ राज्य के पास होने चाहिए या हिज़्बुल्लाह जैसे संगठनों को भी हथियार रखने की अनुमति होनी चाहिए।
इज़रायल और हिज़्बुल्लाह के बीच दुश्मनी क्यों है?
हिज़्बुल्लाह और इज़रायल के बीच दशकों से संघर्ष चलता आ रहा है। 1982 के बाद दोनों पक्षों के बीच कई बार युद्ध और सैन्य टकराव हुए। 2006 का युद्ध सबसे चर्चित संघर्षों में से एक माना जाता है। हिज़्बुल्लाह खुद को लेबनान की रक्षा करने वाली प्रतिरोधी ताकत बताता है, जबकि इज़रायल इसे अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानता है।
लेबनान की राजनीति कैसे चलती है?
लेबनान की राजनीतिक व्यवस्था धार्मिक संतुलन पर आधारित है। परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति ईसाई समुदाय से होता है, प्रधानमंत्री सुन्नी मुस्लिम और संसद का अध्यक्ष शिया मुस्लिम समुदाय से चुना जाता है। संसद में भी विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच सीटों का संतुलन रखा जाता है। इसी जटिल व्यवस्था के बीच हिज़्बुल्लाह अपनी राजनीतिक भूमिका निभाता है।
आज हिज़्बुल्लाह कितना मजबूत है?
लगातार युद्धों, आर्थिक दबाव और नेतृत्व पर हमलों के बावजूद हिज़्बुल्लाह अभी भी मध्य पूर्व की सबसे प्रभावशाली गैर-राज्य ताकतों में गिना जाता है। इसकी ताकत केवल हथियारों में नहीं, बल्कि राजनीति, समाज और क्षेत्रीय गठबंधनों में भी छिपी है। यही कारण है कि लेबनान, इज़रायल और पूरे मध्य पूर्व की राजनीति में हिज़्बुल्लाह आज भी एक निर्णायक भूमिका निभाता है।