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खामेनेई की मौत से भारत पर कितना असर? तेल, चाबहार पोर्ट के अलावा किन चीजों पर पड़ेगा असर

 

Ali Khamenei Death Impact: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मध्य-पूर्व में तनाव चरम पर है। अमेरिका-इस्राइल हमले और ईरान की जवाबी कार्रवाई से तेल कीमतों, भारत की ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार पोर्ट परियोजना और कूटनीतिक संतुलन पर गहरा असर पड़ सकता है। नया नेतृत्व भारत के लिए निर्णायक होगा।

तेहरान में सत्ता का शून्य, क्षेत्र में बढ़ता तनाव

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद देश की राजनीतिक संरचना हिल गई है। सरकारी पुष्टि के अनुसार, अमेरिका और इस्राइल के संयुक्त हमले में उनकी मौत हुई, जिसके बाद पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल गई। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने इराक, खाड़ी देशों और इस्राइल में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। मिसाइल हमलों और सायरन के बीच मध्य-पूर्व एक बार फिर बड़े संघर्ष की दहलीज पर खड़ा दिखाई दे रहा है।

ईरान के संविधान के मुताबिक, स्थायी उत्तराधिकारी चुने जाने तक अस्थायी परिषद सर्वोच्च अधिकार संभालेगी। इस परिषद में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, न्यायपालिका प्रमुख गुलाम होसैन मोहसेनी इजेही और गार्डियन काउंसिल का एक ज्यूरिस्ट शामिल हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था स्थिरता ला पाएगी या सत्ता संघर्ष तेज होगा।

संभावित वारिस और IRGC की भूमिका

खामेनेई ने कथित तौर पर संभावित उत्तराधिकारियों के नाम पहले से तय किए थे। इनमें अयातुल्ला अलीरेजा अराफी, अयातुल्ला मोहसेन अराकी, अयातुल्ला हशेम हुसैनी बुशहरी और खुद मोहसेनी इजेही का नाम प्रमुख है। इसके अलावा खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई भी संभावित दावेदारों में गिने जा रहे हैं। ईरान की सत्ता संरचना में Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) की भूमिका बेहद अहम है। यदि IRGC सीधे नियंत्रण की ओर बढ़ता है, तो देश में सैन्य प्रभाव और बढ़ सकता है। वहीं, आंतरिक गुटबाजी और विरोध प्रदर्शनों की आशंका भी कम नहीं है। हालांकि निकट भविष्य में पूर्ण लोकतांत्रिक बदलाव की संभावना बेहद कमजोर मानी जा रही है।

‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ पर असर

खामेनेई को ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ का रणनीतिक स्तंभ माना जाता था। उनकी मौत के बाद Hezbollah, Houthis और इराकी मिलिशिया जैसे ईरान समर्थित समूहों की रणनीति प्रभावित हो सकती है। छोटे हमले जारी रह सकते हैं, लेकिन तेहरान की सीधी निगरानी और संसाधनों के बिना प्रॉक्सी युद्ध की धार कमजोर पड़ने की आशंका है।

इस बीच क्षेत्र में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखा जा रहा है। बाजारों में अनिश्चितता बढ़ी है और वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर असर की आशंका गहरा रही है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा

भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली सप्लाई लाइन उसकी ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ है। यदि तनाव बढ़ता है या शिपिंग मार्ग बाधित होता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत और दवाओं सहित रोजमर्रा की वस्तुओं पर पड़ेगा।

ऊर्जा महंगाई भारत की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता दोनों के लिए चुनौती बन सकती है।

चाबहार पोर्ट और रणनीतिक समीकरण

भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट में बड़े निवेश किए हैं, ताकि पाकिस्तान को बाईपास कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाई जा सके। 2024 के समझौते के बावजूद, यदि ईरान में नेतृत्व परिवर्तन के साथ गुटबाजी या प्रतिबंधों का दबाव बढ़ता है, तो यह परियोजना प्रभावित हो सकती है। इससे चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की भारत की रणनीति को झटका लग सकता है।


कूटनीतिक संतुलन की कठिन परीक्षा

भारत परंपरागत रूप से ईरान, अमेरिका और इस्राइल- तीनों के साथ संतुलित संबंध रखता आया है। विदेश मंत्रालय ने घटना पर गहरी चिंता जताते हुए संयम और संवाद की अपील की है। लेकिन क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की स्थिति में यह संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में ईरान की एक्सपर्ट्स असेंबली का फैसला, IRGC की भूमिका और आम जनता की प्रतिक्रिया तय करेगी कि देश किस दिशा में जाएगा।

36 साल का संतुलन टूटा, नई अनिश्चितता का दौर

खामेनेई की मौत ने ईरान में 36 वर्षों से चले आ रहे सत्ता संतुलन को तोड़ दिया है। देश अब अस्थायी परिषद, संभावित दावेदारों और बाहरी दबावों के बीच खड़ा है। भारत के लिए यह सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय घटना नहीं, बल्कि ऊर्जा, रणनीति और कूटनीति से जुड़ी गंभीर चुनौती है। आने वाले समय में ईरान का नया नेतृत्व कैसा रुख अपनाता है—यही तय करेगा कि भारत के लिए यह संकट कितना गहरा और कितना लंबा साबित होगा।