खामेनेई जिंदा या निशाने पर? अमेरिका-इजरायल हमलों के पीछे छिपा असली एजेंडा
अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई की लोकेशन रहस्य बनी हुई है। विदेश मंत्री ने उनके जीवित होने का दावा किया है। हमलों में शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया, जिससे ‘रेजीम चेंज’ की आशंकाएं तेज हो गई हैं।
Iran Supreme Leader Khemenai: मिडिल ईस्ट में जारी भीषण तनाव के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई के जीवित होने को लेकर उठे सवालों पर ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बड़ा बयान दिया है। अमेरिकी मीडिया चैनल NBC को दिए इंटरव्यू में अराघची ने कहा कि- खामेनेई और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन दोनों सुरक्षित और जीवित हैं।
हालांकि, अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद से खामेनेई की लोकेशन को लेकर रहस्य बना हुआ है। ईरान के सरकारी टीवी चैनल ‘अल-आलम’ ने दावा किया है कि खामेनेई जल्द ही राष्ट्र को संबोधित करेंगे।
नेतृत्व को निशाना बनाने की रणनीति?
ताज़ा हमलों में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक सात मिसाइलें सर्वोच्च नेता के कार्यालय और राष्ट्रपति के आवास की दिशा में दागी गईं।
हालांकि, अब तक किसी वरिष्ठ ईरानी अधिकारी की हत्या या गंभीर क्षति की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। रॉयटर्स के हवाले से ईरानी सरकारी सूत्रों ने बताया कि हमले के समय खामेनेई तेहरान में मौजूद नहीं थे और उन्हें पहले ही एक सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर दिया गया था।
हमलों की पहली लहर में ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ जो सर्वोच्च नेता का चयन करती है और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) के मुख्यालय को भी निशाना बनाया गया।
क्या एजेंडे में है ‘रेजीम चेंज’?
हालांकि अमेरिका और इजरायल ने सीधे तौर पर सत्ता परिवर्तन की बात नहीं कही, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बयानों ने संकेत दिए कि उद्देश्य केवल सैन्य ढांचे को नुकसान पहुंचाना नहीं है।
ट्रंप ने अपने वीडियो संदेश में सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ का जिक्र करते हुए कहा कि यह ईरान की सैन्य क्षमता और परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने के लिए है। उन्होंने ईरान की जनता से सरकार संभालने का आह्वान भी किया।
वहीं नेतन्याहू ने कहा कि यह हमला “ऐसी परिस्थितियां पैदा कर सकता है जिससे ईरानी जनता अपनी किस्मत खुद तय कर सके।
पहले से अलग है इस बार की रणनीति
एक्सपर्ट्स का कहना है कि पिछले साल जून में अमेरिका ने ईरान के गहरे भूमिगत परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया था, जो आम नागरिक क्षेत्रों से दूर थे। लेकिन इस बार हमलों का केंद्र राजनीतिक नेतृत्व और उनके कार्यालय/आवास रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि रणनीति राजनीतिक ढांचे को कमजोर करने की हो सकती है।
रक्षा और भू-राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और इजरायल ने “रेजीम चेंज” की संभावना के दरवाजे खुले रखे हैं, हालांकि सीधे तौर पर इसकी जिम्मेदारी ईरानी जनता पर डाल दी गई है।
बड़े टकराव की आशंका
ईरान में पहले से ही सरकार विरोधी प्रदर्शन और आंतरिक असंतोष की खबरें आती रही हैं। ऐसे में ताजा हमलों ने क्षेत्रीय अस्थिरता को और बढ़ा दिया है। एक्सपर्टस चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसके दूरगामी भू-राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव पड़ सकते हैं, जिनका असर वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी दिखाई देगा।