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US Iran Deal 2026: ट्रंप की नई ईरान डील पर उठे सवाल, क्या ओबामा के JCPOA से अलग है यह समझौता? क्या है पूरा सच

अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर वैश्विक चर्चा तेज है। परमाणु कार्यक्रम, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और क्षेत्रीय तनाव जैसे मुद्दों पर बनी सहमति के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या ट्रंप की नई डील वास्तव में ओबामा के JCPOA से अलग है।

 

US Iran Deal 2026:अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित नए शांति समझौते ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। मध्य पूर्व में तनाव कम करने, परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण और वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुला रखने जैसे मुद्दों पर सहमति बनने की खबरों के बीच विशेषज्ञ यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह समझौता आखिर 2015 के ऐतिहासिक JCPOA से कितना अलग है।

बताया जा रहा है कि स्विट्जरलैंड में 19 जून को समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होने के बाद यह व्यवस्था लागू हो सकती है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस समझौते को डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में खारिज कर दिया था, क्या अब अमेरिका उसी दिशा में लौट रहा है?

कहां से शुरू हुई अमेरिका-ईरान परमाणु विवाद की कहानी?

अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु विवाद की शुरुआत वर्ष 2002 में हुई, जब दुनिया को पहली बार ईरान के नतांज और अरक स्थित परमाणु कार्यक्रमों की जानकारी मिली। पश्चिमी देशों को आशंका हुई कि ईरान भविष्य में परमाणु हथियार विकसित कर सकता है।

इसके बाद अमेरिका, यूरोपीय देशों और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) का दबाव बढ़ता गया। 2006 के बाद संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोप ने ईरान पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए, जिससे उसका तेल और बैंकिंग क्षेत्र गंभीर संकट में आ गया।

ओबामा युग और 2015 की ऐतिहासिक JCPOA डील

बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने ईरान के साथ कूटनीतिक समाधान की राह चुनी। 2012-13 में ओमान की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच गुप्त बातचीत शुरू हुई। उस समय ईरान में राष्ट्रपति हसन रूहानी थे, जो पश्चिमी देशों के साथ समझौते के समर्थक माने जाते थे।

करीब दो वर्षों तक चली बातचीत के बाद 2015 में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन और ईरान के बीच संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) पर हस्ताक्षर हुए।

JCPOA की प्रमुख शर्तें क्या थीं?

  • परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण
  • यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) को 3.67% तक सीमित किया गया।
  • संवर्धित यूरेनियम का भंडार 300 किलोग्राम तक सीमित रखा गया।
  • हजारों सेंट्रीफ्यूज हटाए गए।
  • IAEA को व्यापक निरीक्षण का अधिकार मिला।

बदले में राहत

  • अमेरिका, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र ने कई आर्थिक प्रतिबंध हटाए।
  • ईरान को वैश्विक व्यापार और वित्तीय प्रणाली में राहत मिली।


ट्रंप ने JCPOA को क्यों ठुकराया?

डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान ही JCPOA को "खराब और एकतरफा समझौता" बताया था। राष्ट्रपति बनने के बाद मई 2018 में उन्होंने अमेरिका को इस समझौते से बाहर निकाल लिया।

ट्रंप की मुख्य आपत्तियां

1. अस्थायी प्रतिबंध

ट्रंप का तर्क था कि कई प्रतिबंध 10-15 साल बाद समाप्त हो जाते, जिससे भविष्य में ईरान फिर परमाणु कार्यक्रम बढ़ा सकता था।

2. मिसाइल कार्यक्रम शामिल नहीं था

उनका मानना था कि समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को शामिल नहीं किया गया।

3. क्षेत्रीय गतिविधियां नजरअंदाज हुईं

ट्रंप प्रशासन चाहता था कि हिजबुल्लाह, हूती विद्रोहियों और अन्य क्षेत्रीय समूहों को ईरान के समर्थन का मुद्दा भी समझौते का हिस्सा बने।

4. प्रतिबंधों से ईरान मजबूत हुआ

ट्रंप का मानना था कि आर्थिक राहत मिलने से ईरान और उसके सहयोगी संगठनों को ताकत मिलेगी।

2025 में सत्ता में वापसी और नई रणनीति

दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ नए समझौते की दिशा में पहल की। प्रस्तावित समझौते में परमाणु हथियारों के विकास पर रोक और क्षेत्रीय तनाव कम करने जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं।

साथ ही वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सभी देशों के लिए खुला रखने की बात भी सामने आई है।

ओबामा और ट्रंप की डील में क्या अंतर?

समानताएं

  • दोनों समझौतों का प्रमुख उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है।
  • परमाणु कार्यक्रम पर निगरानी दोनों व्यवस्थाओं का मुख्य हिस्सा है।

अंतर

JCPOA में परमाणु गतिविधियों पर निगरानी का विस्तृत और स्पष्ट ढांचा था।
विशेषज्ञों के अनुसार नई व्यवस्था की कई शर्तें अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। ट्रंप जिस मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को JCPOA की कमजोरी बताते थे, उन्हें लेकर भी नई डील में स्पष्टता सीमित दिखाई देती है।

विशेषज्ञ क्यों उठा रहे हैं सवाल?

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि यदि अंततः समझौते का मूल उद्देश्य वही है जो 2015 के JCPOA का था, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि पिछले वर्षों में बढ़े तनाव, प्रतिबंधों और संघर्षों से वास्तविक रणनीतिक लाभ क्या मिला।

ओबामा काल का समझौता परमाणु निगरानी के मामले में अधिक स्पष्ट और संस्थागत था, जबकि नई व्यवस्था का अंतिम मूल्यांकन उसके आधिकारिक दस्तावेज सामने आने के बाद ही किया जा सकेगा।

आगे क्या?

अब पूरी दुनिया की नजर 19 जून को प्रस्तावित हस्ताक्षर प्रक्रिया पर टिकी है। यदि समझौता लागू होता है तो यह न केवल अमेरिका और ईरान के रिश्तों में नया अध्याय जोड़ सकता है, बल्कि मध्य पूर्व की सुरक्षा, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकता है।