महंगा ईंधन, घटती आमदनी और छूटता स्कूल... ईरान युद्ध का बच्चों पर दिखने लगा असर, UNICEF ने दी चेतावनी
Iran War Impact : ईरान युद्ध का असर अब केवल युद्ध क्षेत्र और वैश्विक बाजारों तक सीमित नहीं रह गया है। महंगे ईंधन, बढ़ती परिवहन लागत और महंगाई ने गरीब देशों में रहने वाले परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है और आर्थिक संकट बढ़ने पर लाखों बच्चों के स्कूल छोड़ने का खतरा पैदा हो गया है।
कंबोडिया के टोनले साप झील क्षेत्र में रहने वाली 13 वर्षीय सौ स्रेयनिच की कहानी इस संकट की गंभीरता को समझने के लिए काफी है। स्रेयनिच का सपना शिक्षक बनने का है, लेकिन उनकी पढ़ाई पहले ही कई साल पीछे है। उन्होंने 10 साल की उम्र में पहली बार स्कूल जाना शुरू किया था। उनकी मां ने उन्हें स्कूल भेजने में इसलिए देरी की थी, क्योंकि नाव से स्कूल जाते समय हादसे का डर था।
अब महंगे ईंधन ने परिवार की आर्थिक स्थिति और खराब कर दी है। परिवार मछली पकड़ने पर निर्भर है, लेकिन ईंधन की कीमत बढ़ने से वे उन गहरे पानी वाले इलाकों तक नहीं जा पा रहे हैं, जहां अधिक मछलियां मिलती हैं। आमदनी घटने पर स्रेयनिच को भी अपने माता-पिता के साथ काम करने के लिए स्कूल छोड़ना पड़ता है।
साल के अंत तक 2.34 करोड़ अतिरिक्त बच्चे गरीबी में जा सकते हैं
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर युद्ध का आर्थिक असर जारी रहता है तो साल के अंत तक 2.34 करोड़ तक अतिरिक्त बच्चे गरीबी में जा सकते हैं। इनमें करीब 80 प्रतिशत बच्चे अफ्रीका और एशिया के होंगे।
गरीबी बढ़ने के साथ परिवारों के सामने भोजन, ईंधन, किराया और बिजली जैसे जरूरी खर्च पूरे करने की चुनौती बढ़ रही है। ऐसे में बच्चों की शिक्षा अक्सर प्राथमिकता से बाहर हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक संकट गहराने पर परिवार कुछ बच्चों को स्कूल में रखने और अन्य बच्चों को कमाई के लिए काम पर भेजने जैसे कठिन फैसले लेने को मजबूर हो सकते हैं।
वियतनाम में दो बहनों को छोड़ना पड़ा स्कूल
वियतनाम में 16 वर्षीय ली और उनकी 13 वर्षीय बहन न्हीं का परिवार भी महंगे डीजल की मार झेल रहा है। उनके पिता मछली पकड़ने का काम करते थे, लेकिन ईंधन महंगा होने के बाद नाव मालिकों के लिए समुद्र में जाना मुश्किल हो गया। परिवार के पास नौ बच्चों की पढ़ाई और भोजन का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं बचे।
आर्थिक तंगी के कारण दोनों बहनों ने स्कूल छोड़ दिया और हनोई के एक रेस्तरां में काम करना शुरू कर दिया। वहां उन्हें गर्म सतहों, तेज औजारों और भारी सामान उठाने जैसे जोखिमों का सामना करना पड़ा। 13 वर्षीय न्हीं का काम करना बाल श्रम कानूनों के तहत भी अवैध था। बाद में Blue Dragon Children’s Foundation के हस्तक्षेप के बाद दोनों बहनें दोबारा स्कूल लौट सकीं।
महंगे ईंधन से स्कूल चलाना भी हुआ महंगा
ईंधन की बढ़ती कीमत का असर सिर्फ बच्चों के स्कूल पहुंचने तक सीमित नहीं है। दूरदराज के इलाकों में शिक्षकों और सहायता कर्मियों के पहुंचने, स्कूलों तक जरूरी सामान पहुंचाने और कक्षाओं के लिए आवश्यक सामग्री खरीदने की लागत भी बढ़ रही है।
टोनले साप जैसे क्षेत्रों में चुनौती और बड़ी है, क्योंकि यहां बड़ी मात्रा में सामान नावों के जरिए पहुंचता है। स्थानीय शिक्षा कार्यकर्ताओं के मुताबिक बिजली और अन्य बुनियादी सेवाओं की लागत में भी तेज बढ़ोतरी हुई है। दूसरी तरफ सरकारों पर ईंधन, खाद्य पदार्थों और सब्सिडी का खर्च बढ़ रहा है। इससे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के लिए उपलब्ध सरकारी बजट पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
आर्थिक संकट में लड़कियों पर ज्यादा पड़ सकता है असर
दक्षिण एशिया में आर्थिक संकट का असर लड़कियों की शिक्षा पर विशेष रूप से गंभीर हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, आर्थिक दबाव बढ़ने पर कुछ गरीब परिवार बेटों की पढ़ाई को प्राथमिकता देते हैं और लड़कियों को स्कूल से बाहर कर दिया जाता है। इससे बाल विवाह का खतरा भी बढ़ सकता है।
UNICEF के अनुसार, दुनिया में बाल विवाह करने वाली लड़कियों में करीब 45 प्रतिशत दक्षिण एशिया से हैं। ऐसे में आर्थिक संकट इस क्षेत्र में लड़कियों की शिक्षा और सुरक्षा के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकता है।
46.6 करोड़ बच्चों को मिलता है स्कूल में भोजन
दुनिया भर में 46.6 करोड़ से अधिक बच्चों को स्कूल में कम से कम एक भोजन मिलता है। स्कूल भोजन कार्यक्रम बच्चों को स्कूल से जोड़े रखने के साथ उनके पोषण, सीखने और एकाग्रता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लेकिन युद्ध के कारण उर्वरक और परिवहन लागत बढ़ने से इन कार्यक्रमों पर भी दबाव बढ़ सकता है। पश्चिम और मध्य अफ्रीका के वे देश खास तौर पर प्रभावित हो सकते हैं, जो खाद्य पदार्थों के लिए आयात पर काफी निर्भर हैं।
उत्तर नाइजीरिया में स्थानीय स्वास्थ्य एवं सहायता कर्मियों के अनुसार बच्चों में कुपोषण की समस्या फिर बढ़ती दिखाई दे रही है। ऐसे में ईंधन और खाद्य कीमतों में लंबे समय तक बनी रहने वाली तेजी बच्चों की शिक्षा के साथ उनके पोषण और स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल सकती है।