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ईरान की बड़ी चेतावनी: अमेरिकी ठिकानों के इस्तेमाल पर होगा जवाबी हमला, विदेश मंत्री का दावा

 

Tehran/New Delhi : ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने दावा किया है कि अमेरिका और इजरायल की कथित संयुक्त सैन्य कार्रवाई के दौरान वह उस समय ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व के कार्यालय में मौजूद थे, जब वहां हमला हुआ था। उन्होंने कहा कि हमले के बाद उनकी सबसे बड़ी चिंता शीर्ष नेतृत्व की सुरक्षा को लेकर थी।

ईरानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लेबनान स्थित अल मायादीन टीवी को दिए एक साक्षात्कार में अरागची ने कहा कि हमले के समय वह उसी परिसर में मौजूद थे, जिस पर निशाना साधा गया था। उन्होंने बताया कि मलबे से बाहर निकलने के बाद उन्होंने कई घंटे अनिश्चितता की स्थिति में बिताए और शीर्ष नेतृत्व की स्थिति को लेकर चिंतित रहे।

हमले के दौरान हुई बातचीत का किया जिक्र

अरागची ने दावा किया कि संकट के समय शीर्ष नेतृत्व ने सुरक्षित स्थान पर जाने से इनकार करते हुए कहा था कि जब तक आम नागरिकों के लिए पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, तब तक वे स्वयं किसी विशेष सुरक्षा व्यवस्था का लाभ नहीं लेंगे। 

विदेश मंत्री ने कहा कि उस कठिन दौर में देश के नेतृत्व और जनता के बीच एकजुटता का संदेश दिया गया था, जिसने ईरानी समाज को मजबूती प्रदान की।

अमेरिकी ठिकानों को लेकर दी चेतावनी

साक्षात्कार के दौरान अरागची ने कहा कि यदि ईरान के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई में क्षेत्रीय देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों का इस्तेमाल किया जाता है, तो ईरान जवाबी कार्रवाई का अधिकार सुरक्षित रखता है। उनका दावा था कि कुछ खाड़ी देशों ने अपनी जमीन के सैन्य उपयोग को लेकर आपत्ति जताई थी, लेकिन उनकी चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान ईरान की प्रतिक्रिया ने कई देशों को आश्चर्यचकित कर दिया था। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतनी तेज और व्यापक प्रतिक्रिया की उम्मीद कम लोगों को थी।

वर्तमान नेतृत्व की भूमिका पर जताया भरोसा

अरागची ने वर्तमान नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि देश के प्रशासनिक और रणनीतिक मामलों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि देश की जनता और संस्थानों का समर्थन नेतृत्व के साथ बना हुआ है।

हालांकि क्षेत्र में संघर्ष विराम लागू होने के बाद बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई में कमी आई है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि दोनों पक्षों के बीच अविश्वास और रुक-रुक कर सामने आने वाली तनावपूर्ण घटनाओं के कारण स्थिति अभी भी संवेदनशील बनी हुई है। ऐसे में स्थायी शांति के लिए कूटनीतिक प्रयासों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।