17 जून को हुई दोस्ती, 2 हफ्ते बाद फिर बमबारी... आखिर क्या है MoU का Article 5, जिसने अमेरिका-ईरान में फिर बढ़ा दिया तनाव
US Iran Peace Deal: मिडिल ईस्ट में शांति बहाल करने की उम्मीद के साथ 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच जिस अंतरिम शांति समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे, वह मुश्किल से दो सप्ताह भी नहीं टिक पाया। हालिया सैन्य हमलों और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़े तनाव ने दोनों देशों को एक बार फिर आमने-सामने ला खड़ा किया है। वाशिंगटन और तेहरान अब एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं। इस पूरे विवाद की जड़ में MoU का Article 5 है, जिसकी व्याख्या दोनों देश अपने-अपने तरीके से कर रहे हैं। यही वजह है कि जिस समझौते से शांति की उम्मीद थी, वही अब नए टकराव का कारण बन गया है।
शांति समझौते का उद्देश्य क्या था?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच 17 जून को हुए अंतरिम शांति समझौते का मकसद दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ रहे सैन्य तनाव को कम करना और बातचीत का रास्ता खोलना था। कई महीनों से प्रतिबंधों, परमाणु कार्यक्रम और समुद्री सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के संबंध बेहद तनावपूर्ण बने हुए थे। ऐसे में यह समझौता एक अस्थायी लेकिन महत्वपूर्ण पहल माना गया, जिसके जरिए दोनों पक्षों ने आगे कूटनीतिक वार्ता जारी रखने पर सहमति जताई।
समझौते में ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों, उसके परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चरणबद्ध बातचीत की रूपरेखा तय की गई थी।
दो हफ्ते बाद ही क्यों बिगड़ गए हालात?
समझौते के बाद कुछ दिनों तक स्थिति सामान्य दिखी, लेकिन 25 जून को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे एक व्यापारिक जहाज पर हुए हमले ने पूरे घटनाक्रम को बदल दिया। अमेरिका ने इस हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराते हुए जवाबी कार्रवाई की। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव लगातार बढ़ता गया।
हालात तब और गंभीर हो गए जब 8 जुलाई को अमेरिका ने ईरान के करीब 90 ठिकानों पर कार्रवाई की। इसके बाद ईरान ने भी अमेरिका पर शांति समझौते का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। तभी से दोनों देशों के बीच विवाद का केंद्र Article 5 बन गया है।
क्या कहता है MoU का Article 5?
दरअसल, Article 5 पूरी तरह Strait of Hormuz यानी होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही से जुड़ा हुआ है। इस प्रावधान के तहत दोनों देशों ने सहमति जताई थी कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को फिर से पूरी तरह खोला जाएगा ताकि वैश्विक व्यापार प्रभावित न हो।
समझौते के अनुसार, ईरान व्यापारिक जहाजों को फारस की खाड़ी से ओमान सागर तक सुरक्षित आवाजाही की सुविधा देगा। शुरुआती 60 दिनों तक किसी भी जहाज से अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा। साथ ही, 30 दिनों के भीतर समुद्री मार्ग से बारूदी सुरंगों और अन्य सैन्य बाधाओं को हटाकर सामान्य शिपिंग व्यवस्था बहाल करने का लक्ष्य रखा गया था। भविष्य में इस मार्ग के प्रशासन और समुद्री सेवाओं को लेकर ओमान तथा अन्य क्षेत्रीय देशों के साथ भी बातचीत का प्रावधान किया गया था।
फिर Article 5 पर विवाद क्यों हुआ?
समझौते की भाषा पर दोनों देशों में कोई विवाद नहीं है, लेकिन उसे लागू करने के तरीके को लेकर मतभेद गहरा गया है। अमेरिका का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पहले की तरह पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग के रूप में संचालित होना चाहिए, जहां किसी भी देश का अतिरिक्त नियंत्रण या हस्तक्षेप न हो। अमेरिका चाहता है कि सभी व्यापारिक जहाज बिना किसी रोक-टोक और बिना किसी अतिरिक्त निर्देश के स्वतंत्र रूप से आवागमन करें।
वहीं ईरान का कहना है कि होर्मुज उसकी सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा क्षेत्र है। इसलिए शुरुआती अवधि में समुद्री मार्ग की निगरानी और प्रबंधन उसी के नियंत्रण में रहेगा। ईरान यह भी चाहता है कि जहाज उसके तय किए गए उत्तरी शिपिंग कॉरिडोर का इस्तेमाल करें। तेहरान का दावा है कि यह व्यवस्था समझौते के अनुरूप ही है और किसी बाहरी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जा सकती। यही अलग-अलग व्याख्या आज दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद बन चुकी है।
आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है होर्मुज?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। यह फारस की खाड़ी को ओमान सागर और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन और इराक जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों का अधिकांश निर्यात इसी मार्ग पर निर्भर करता है।
यदि यह समुद्री मार्ग बाधित होता है तो केवल मध्य-पूर्व ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों, महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
ईरान की भौगोलिक स्थिति क्यों बनती है उसकी सबसे बड़ी ताकत?
होर्मुज जलडमरूमध्य का उत्तरी हिस्सा पूरी तरह ईरान की सीमा से लगा हुआ है। इसी वजह से इस क्षेत्र पर उसकी रणनीतिक पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है। दूसरी ओर अमेरिका लंबे समय से ओमान की खाड़ी और आसपास के समुद्री क्षेत्र में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बनाए हुए है। दोनों देशों की सैन्य उपस्थिति और अलग-अलग रणनीतिक हित इस क्षेत्र को दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में शामिल करते हैं।
यही कारण है कि जब भी अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है, सबसे पहले असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर दिखाई देता है।
क्या फिर गहरा सकता है मिडिल ईस्ट संकट?
फिलहाल अमेरिका और ईरान दोनों सार्वजनिक रूप से यह दावा कर रहे हैं कि वे व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के पक्ष में हैं। हालांकि, Article 5 को लेकर बनी असहमति और हालिया सैन्य कार्रवाई ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और बढ़ा दिया है। यदि आने वाले दिनों में कूटनीतिक स्तर पर कोई ठोस समाधान नहीं निकला तो यह विवाद केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।