'घूसखोर पंडत’ पर सियासी घमासान : अखिलेश यादव ने बीजेपी को घेरा, बोले- घड़ियाली आंसू बहाकर दिखावे...
लखनऊ। रिलीज से पहले ही फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ विवादों के घेरे में आ गई है। अब यह मामला सिर्फ सिनेमा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक रंग भी ले चुका है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस फिल्म को लेकर भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबा पोस्ट लिखकर अपनी नाराज़गी जाहिर की।
अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि भाजपा लगातार ऐसी साजिशें करती रही है, जिनके जरिए किसी समाज के कुछ लोगों का इस्तेमाल उसी समाज के खिलाफ किया जाता है। उन्होंने कहा कि कभी बयानबाजी के जरिए, कभी बैठकों में नोटिस देकर और कभी पैसा लगाकर विज्ञापन, प्रचार सामग्री या फिल्म बनवाकर किसी समाज विशेष को टारगेट किया जाता है और उसे अपमानित किया जाता है।
‘विवाद बढ़ते ही बीजेपी रंग बदल लेती है’
पूर्व मुख्यमंत्री ने लिखा कि जब ऐसे मामलों में विवाद गहराने लगता है, तो भाजपा गिरगिट की तरह रंग बदल लेती है। वह घड़ियाली आंसू बहाकर दिखावे की कार्रवाई करती है, लेकिन हकीकत में उसे लक्षित समाज के अपमान और उत्पीड़न से कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी अंदर ही अंदर ऐसे मामलों से खुश होती है।
‘फिल्म का नाम बेहद अपमानजनक’
अखिलेश यादव ने कहा कि मौजूदा फिल्मी विवाद में वह फिल्म का नाम तक नहीं लेना चाहते, क्योंकि उसका शीर्षक सिर्फ आपत्तिजनक ही नहीं, बल्कि बेहद अपमानजनक है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ऐसी फिल्में नाम बदलकर भी रिलीज नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे समाज को ठेस पहुंचती है।
‘आर्थिक नुकसान होगा, तभी रुकेगा यह चलन’
उन्होंने कहा कि जब तक इस तरह की फिल्मों से निर्माताओं को आर्थिक नुकसान नहीं होगा, तब तक ऐसी फिल्में बनती रहेंगी। पैसे के लालच में कुछ लोग राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। यह ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ का मुद्दा नहीं है, बल्कि ‘रचनात्मक समझ’ का सवाल है। अगर कोई फिल्म जानबूझकर किसी एक समाज की भावनाओं को आहत करती है, तो उसे मनोरंजन नहीं कहा जा सकता।
‘समाज का दर्पण मैला नहीं होना चाहिए’
अखिलेश यादव ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब तक ही स्वीकार्य है, जब तक वह किसी की गरिमा और सम्मान को ठेस न पहुंचाए। सिनेमा को समाज का दर्पण माना जाता है, लेकिन यह दर्पण मैला और मलिन नहीं होना चाहिए। उन्होंने मांग की कि ऐसी फिल्मों के पीछे छिपे एजेंडे और फंडिंग की भी जांच होनी चाहिए, ताकि समाज में नफरत फैलाने वालों का सच सामने आ सके।
फिल्म को लेकर उठे इस विवाद के बाद आने वाले दिनों में सियासी बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं।