पत्नी से खर्च का हिसाब मांगना क्रूरता नहीं: सुप्रीम कोर्ट, कहा- वैवाहिक विवाद में बदले का हथियार न बने कानून
New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बिगड़े हुए वैवाहिक संबंधों की स्थिति में पति द्वारा अलग रह रही पत्नी पर वित्तीय प्रभुत्व या खर्च का हिसाब मांगना अपने आप में क्रूरता का कृत्य नहीं है। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमों का इस्तेमाल बदला लेने या व्यक्तिगत प्रतिशोध के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें अलग रह रही पत्नी द्वारा पति और उसके परिवार के खिलाफ क्रूरता और दहेज उत्पीड़न के आरोप में दर्ज प्राथमिकी को रद्द किया गया। इस फैसले के साथ ही अदालत ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एफआईआर रद्द करने से इनकार किया गया था।
फैसला लिखते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पत्नी पर कथित मौद्रिक और वित्तीय दबदबा तब तक क्रूरता नहीं माना जा सकता, जब तक उससे कोई ठोस मानसिक या शारीरिक क्षति साबित न हो। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय समाज में अक्सर पुरुषों द्वारा महिलाओं के वित्तीय मामलों पर नियंत्रण की प्रवृत्ति देखी जाती है, लेकिन केवल इसी आधार पर आपराधिक कार्रवाई उचित नहीं है।
अदालत ने पति द्वारा पत्नी को भेजी गई रकम के खर्च का विवरण मांगे जाने को भी क्रूरता मानने से इनकार किया। पीठ ने कहा कि वैवाहिक मामलों में अदालतों को अत्यंत सतर्कता बरतनी चाहिए और आरोपों की जांच व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए विवेकपूर्ण ढंग से करनी चाहिए, ताकि कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोका जा सके।
यह फैसला 19 दिसंबर को उस अपील पर सुनाया गय, जो पति ने हाईकोर्ट के 27 अप्रैल 2023 के आदेश के खिलाफ दायर की थी।